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Tuesday, October 25, 2016

बेबसी का जीवन

नहीं मरनी चाहिए
पति से पहले पत्नी
पति का भीतर-बाहर
सब समाप्त हो जाता है

घर भी नहीं लगता
फिर घर जैसा
अपने ही घर में पति
परदेशी बन जाता है

बिन पत्नी के
पति रहता है मृतप्रायः
निरुपाय,अकेला
ठहरे हुए वक्त सा और
कटे हुए हाल सा

घर बन जाता है
उजड़े हुए उद्यान सा
बेवक्त आये पतझड़ सा

ढलने लग जाती है
जीवन की सुहानी संध्या
रिक्त हो जाता है
बिन पत्नी के जीवन

अमावस का अन्धकार
छा जाता है जीवन में
बेअर्थ हो जाता है
फिर जीना जीवन।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]