Showing posts with label काश कोई लौट आए अपना. Show all posts
Showing posts with label काश कोई लौट आए अपना. Show all posts

Wednesday, November 21, 2018

काश कोई लौट आए अपना

गाँव के नौजवान
जो गाँव के गौरव थे
शहर चले गए
वो चलाते हैं वहाँ रिक्शा
खींचते हैं गाड़ियाँ
करतें हैं दिहाड़ी
भरते हैं पेट अपना।

गाँव की ललनायें
जो गाँव की शोभा थी
शहर चली गईं 
वो वहाँ करती हैं 
घरों में चौका-बरतन
लगाती हैं पोंछा 
धोती हैं कपड़ा
भरती हैं पेट अपना।

गाँव के नौनिहाल
जो गाँव की मुस्कान थे
शहर चले गए
वो वहाँ करते हैं
गाड़ियों की धुलाई
ढाबों पर खिलाते हैं खाना
भट्टों पर करते हैं काम
भरते हैं पेट अपना।

गाँव में अब केवल
बुड्ढे रहते हैं
जो राह में आँखें बिछाये
करते हैं इन्तजार
काश ! कोई लौट आए अपना।



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )