Friday, April 29, 2016

नाईट कल्ब

बहु देख रही है
फैशन मैगजीन में अपने लिए
लेटेस्ट डिजाइन किया हुआ परिधान
उसे अपने आप को साबित करना है
किटी पार्टी की सहेलियों के बिच में

चौंका देना चाहती है वह सबको
शादी की साल गिरह की पार्टी
शहर के महंगे नाईट कल्ब में देकर
उसे दिखना है अपना वजूद
फ्रेंड सर्कल के बिच में

शराब के टकराते जाम
धुऐं के उठते गुब्बार
नाचती बार बालाओं के बिच
उसे दिखाना है अपने आप को मॉडर्न
सोसाइटी के बिच में

आश्वस्त होती है
मेरी कविता यह सब देख कर
तुलसी की जगह कैक्टस
रोपने के दिन आ गए हैं  बिच में।





Wednesday, April 27, 2016

दीवाली और तुम्हारी यादें

दिवाली है आज
बहुएं-बेटे दीप जला कर
कर रहे हैं घर में रोशनी

पोते-पोतियां
हर साल की तरह
जला रहे हैं आतिशबाजी

खाने की थाली
सजा रही है बहुएं
कराने सबको साथ भोजन

आज तुम नहीं हो
कौन करेगा मनवार
कि थोड़ा तो और लो

कौन पूछेगा आज
कैसा बना है हलवा ?
कैसा बना है
कांजी बड़े का पानी ?

मेरी दीवाली तो तब होती
जब तुम मेरे साथ होती
बिना तुम्हारे क्या तो दिवाली
और क्या होली।


कोलकाता
३० अक्टुम्बर,२०१६


सुबह का सपना

लोग कहते हैं
सुबह का सपना
सच होता है

आज देखा
मैंने तुम्हें सुबह के
सपने में

तुम मेरे पास बैठी
चाय की चुस्कियाँ
ले रही थी 

एक अजीब सा
सुकून था
तुम्हारे चहरे पर

चमक रही थी
तुम्हारी आँखें
जैसे कभी भीगी न हो

तुम हंस-हंस कर
बाते कर रही थी
मुझसे

अचानक
घड़ी का अलार्म
बज उठा

आँखें खुल गई
नींद उचट गई
सपना टूट गया

काश ! लोगो का कहना
सच हो जाए
मेरा सुबह का सपना
सच हो जाए।





Friday, April 15, 2016

धर कूंचा धर मंजलां रै

बाळू म्हारी सोने री खान रै
इरो सगळा करै गुमान रै
आतो धोरा री मुसकान रै
निपजै मीठा बोर मतीरा रै
धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळु बाजरियाँ लहरावे रै
काती खळो काढ़ ने ल्याव रै
आतो कोसा-कोस उड़ ज्यावै रै
जद बैवे बायरो झिणो रै
धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळू मैहक बिरखा मांई रै
जद भरयो भादवो गाजे रै
आतो घणी सोवणी लागै रै 
जद चौमासे खैती निपजै रै
धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळु उंदाळे री रमझोळ रै
चालै आंध्यां घणी खेंखाती रै
आतो पसरै कोसां कोस रै
ढकदे घर आंगणा गौर रै 
धर कूंचा धर मंजलां रै।





Thursday, April 14, 2016

बेदर्द जिंदगी

मेरे पास अब केवल तुम्हारी यादें बची हैं
उन यादों के सहारे ही मैं जिए जा रहा हूँ।

मेरी जान तो तुम्हारे साथ ही  निकल गई
अब तो बस जिंदगी को घसीटे जा रहा हूँ।

शोक सागर पर खड़ा कर दिया तुमने मुझे
आँसुओं की सौगात लिए जिए जा रहा हूँ।

तुम्हारे बिना विरान हो गई है मेरी जिंदगी
हर सांस में अब दर्द को ही जिए जा रहा हूँ।

जीवन तो वही था जो तुम्हारे साथ जिया
अब तो दर्द दिल में बसाए जिए जा रहा हूँ।

मैं तो भूल गया प्यार भरे गीतों को गाना
तेरी याद में दर्द भरे गीत लिखे जा रहा हूँ। 







अंतहीन इन्तजार

आज फिर गया था
फरीदाबाद वाले घर
दरवाजे पर पहुंचा
तो सोचा
तुम सामने आओगी
लेकिन तुम नहीं आई

सीधा तुम्हारे कमरे में गया
लेकिन तुम नहीं थी वहाँ भी
खाली मन से कमरे-दर-कमरे
ढूंढता रहा तुम्हें

लगता रहा कि
किसी न किसी कमरे से
तुम अभी निकल आओगी

रसोई में पड़ा था
तुम्हारा लोटा और गिलास
जिससे तुम पीया करती थी पानी

मैंने भरा गिलास
और पी गया बिना प्यास के ही
पर मन नहीं भरा

छलकती रही आँखें
तुम्हारे अंतहीन
इन्तजार में।






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Friday, April 8, 2016

माँ का आशीर्वाद

आज से ठीक चार महीने पहले
घर में खुशियों का माहौल था
किसी का भी पाँव जमीं पर
नहीं टिक रहा था

मम्मी-पापा की शादी की
गोल्डन जुबली मनाई थी
सबने साथ मिल कर
ढेरों खुशियाँ बाँटी थी

लेकिन आज लगता है जैसे
जीवन में सब कुछ थम गया है
जीवन की राह में एक
पूर्ण विराम लग गया है

अचानक मम्मी हम सब को 
अकेले छोड़ कर चली गई
अपनी ईह लीला समाप्त कर
ईश्वर में विलीन हो गई

अब तो लगता है बिना मम्मी
के घर जैसे वीरान हो गया है
खुशियों से भरे जीवन में
वृजपात हो गया है

किससे जाकर कहूँ कि मम्मी
तुम्हारी बहुत याद आती है
हर पल तुम्हारी यादें
आँखों से अश्रु बहाती है।

लेकिन लगता है
मम्मी हमारे साथ ही है
वो हमारे जीवन का
पथ-प्रदर्शन कर रही है

जब तक मम्मी का
आशीर्वाद हमारे साथ है
जीवन खुशियों से भरा रहेगा
ऐसा हमरा विश्वाश है।


फरीदाबाद
२० सितम्बर,२०१४

लेखक - मनीष कांकाणी