Monday, August 31, 2015

रंग भरे जिन्दगी में

तुमसे बिछुड़ मेरी प्रीत टूट गई जिन्दगी से         
तुम आओ तो फिर से नेह जगे जिन्दगी में।    

पतझड़ का मौसम छा गया मेरी जिन्दगी में    
     तुम आओ तो फिर से बसंत खिले ज़िन्दगी में।            

 सम्भाल रखें हैं मैंने टूटी माला के मनके        
तुम आओ तो फिर से सजाए जिन्दगी में।                        

                                               मुझे हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या होगा
                                               अगर तुम्हारा  साथ नहीं मिले जिन्दगी में।         

  मुझे और कुछ नहीं चाहिए इस जिन्दगी में                                                                                                  
अगर तुम फिर से हमसफ़र बनो जिन्दगी में।            

    मेरी ये कविताए बंदनवार है प्रतीक्षा की       
   तुम आओ तो फिर से रंग भरे जिन्दगी में।  



                                              [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]



Friday, August 21, 2015

एक पेड़ जरूर लगाना

घर चाहे जैसा भी बनाना
लेकिन उसमे एक कोना
दिल खोल कर हँसने के लिए
जरूर रखना

सूरज की रोशनी
और चाँद की चाँदनी
घर में झाँक सके उतनी
खिड़की खोल कर
जरूर रखना

रात को
चाँद सितारों का
नजारा देख सको उसके लिए
घर में एक खुली छत
जरूर रखना

सुख-दुःख में
दो बात कर सको उसके लिए
घर के बगल में एक पड़ोस
जरूर रखना

शाम को चिड़ियों की
चहचाहट सुन सको उसके लिए
घर के सामने एक पेड़
जरूर लगाना।

सुख गया नैनों का पानी

 ओ सावन के कारे मेघा,जाकर देना उसको पाती   
बेटे-बहुएँ याद कर रहे, याद कर रही पोती रानी।         

                         बच्चे दादी-दादी करते, बहता नयनों से पानी               
        अब उनको गोदी में लेकर ,कौन सुनाए रोज कहानी।      

मीठी-मीठी लौरी गाकर, पोती रोज सुलाया करती                                                                                           परियों की बातें बतलाती, बात नहीं है बहुत पुरानी।                                                                                                        
        दरवाजे पर गुड़ खाने को, आ जाती है धौली-काली         
             कहना उसको याद कर रही,अंगना की तुलसी रानी।             

शाम ढले मंदिर की घण्टी,प्रभु की महिमा जब गाती                                                                                          कहना उसको याद कर रही, घर की दीया ओ बाती।                                                                                                            
       मेरे सुख-दुःख की तुम,मत करना कोई भी बात     
             रोते-रोते सूख गया है, अब मेरे नयनों का पानी।         

 

 यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है ]

Thursday, August 20, 2015

अनुभूति

मेज के सामने बैठा
निस्पंद झांक रहा हूँ
मैं अतीत में

मेरे मानस पटल पर
उतरने लगी है
तुम्हारी यादें

उभरने लगी हैं तस्वीरें
बल्कि पूरा का पूरा
परिदृश्य

बालों को गर्दन के पीछे
समेटती तुम खड़ी हो
मेरे पास

तुम्हारे बदन की
संदली सुगंध
फ़ैल रही है कमरे में

अपनी गर्दन पर
महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी
साँसों का गुदगुदा स्पर्श

तुम पढ़ रही हो मेरी लिखी 
कविता की एक-एक पंक्ति
और कह रही हो 
वाह! वाह ! वाह !

सब कुछ
पहले जैसा ही 
स्मरण हो रहा है आज  

लेकिन मेरा बढ़ा हाथ
नहीं छू पा रहा है
तुम्हारा गात।




                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]







Wednesday, August 12, 2015

दही बड़े

दही बड़े भई दही बड़े
खाए उसको बड़े बड़े

सबसे पहले बड़ा बनाओ
उसके ऊपर दही लगाओ
इमली की चटनी बनवाओ
बड़े प्यार से उसे सजाओ

जब खाने को मन ललचाये
मुंह में जब पानी भर आये
लगा के लाइन हुओ खड़े
खाओ मिल कर छोटे बड़े

दही बड़े भई दही बड़े
खाए उसको बड़े बड़े।

Tuesday, August 11, 2015

तुम भी कहीं भीगती होगी

मेरे आस-पास
भीगी-भीगी है सुबह-शाम
बादल आज भी आए हैं
बरसाने पानी

पिछले तीन दिनों से
नहीं निकल रहा सूरज 
खिड़की पर हल्की धूप 
कभी-कभार
टपक पड़ती है भूल से 

शहर तो वैसा ही है 
पहले की तरह 
सड़के और गलियाँ
बन गई है ताल-तलैया
गाड़ियाँ रेंग रही है सडको पर 

भीगी हवाएं जब भी
तन से टकराती है
तुम्हारी कोमल छुअन की
मीठी यादें ताजा कर जाती है

गीली आँखों में
उमड़ पड़ते हैं यादों के बादल
मेरे आँखों के बादल से
तुम भी कहीं भीगती होगी।




                                             [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]






Friday, August 7, 2015

मन जब खोया रहता है

मन जब-जब खोया रहता है
चैत की चाँदनी सा सुख देती
तुम्हारी यादें

तन्हाईयाँ जब रुलाती है
जीवन का सम्बल बनती
तुम्हारी यादें

दुःख के बादल जब गहराते
दीप्त तारे सी चमकती
तुम्हारी यादें 

तन्हा दिल जब पुकारता
रात रानी सी गमकती  
तुम्हारी यादें

कितना कुछ जीता है मुझमें
अनमोल सौगातें हैं  
तुम्हारी यादें

लौट आओ एक बार
फिर उसी तरह
जिस तरह मुड़-मुड़ कर
लौट आती है तुम्हारी यादें।



 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]