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Friday, February 2, 2018

कांटे बिछा कर नहीं

तुम अपना घर चाहे जीतनी रोशनी से सजाओ
मगर किसी कोठरी का दीपक बुझा कर नहीं।

तुम अपने लिए चाहे जितने ऐशगाह बनाओ
मगर किसी का आशियाना उजाड़ कर नहीं।

तुम अपने घर में चाहे जीतनी खुशियाँ मनाओ
मगर किसी बेबस की खुशियाँ छीन कर नहीं।

तुम अपने लिए चाहे  जितने पकवान बनाओ
मगर किसी गरीब का निवाला छीन कर नहीं।

तुम अपने लिए चाहे जितने  फूल  बिछाओ
मगर किसी की राह में कांटे बिछा कर नहीं। 




( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )