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Saturday, June 22, 2019

ढलते मौसम के साथ

काश!
तुम मिलो फिर से
किसी राह पर
किसी मोड़ के बाद

हो सके तो चलो
फिर से एक बार
मेरे साथ जिंदगी के
बचे सफर में

मौसम को देख
कुछ आशाएं
कुछ इच्छाएं
उठती है मेरे दिल में

जैसे ठूँठ में
फूटती है कोंपले
बदलते मौसम के साथ।

 

( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )