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Monday, November 11, 2013

मेरी चाहत है

मेरी चाहत है
तोड़ लाऊं मेहंदी के पत्ते
लगाऊं चटक रंग तुम्हारी
हथेलियों पर और 
सजाऊं तुम्हें  

मेरी चाहत है 
समंदर से चुन लाऊं 
मोतियों वाली सीपियाँ 
और बना कर सुन्दर हार
पहनाऊं तुम्हें  

मेरी चाहत है 
बगीचे में जाकर 
चुन लाऊँ बेला के फूल 
और बना कर गजरा 
सजाऊँ तुम्हें 

मेरी चाहत है 
इंद्रधनुष के रंगो में
रंगाऊँ  रेशम की चुन्दडी
और लगा कर चाँद-सितारे
औढ़ाऊँ तुम्हें।


  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]