Friday, June 25, 2010

बचपन

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बारह बर्ष की  
बाली उम्र में जब
खेलने-कूदने,पढने लिखने
 और मौज मस्ती के दिन थे
 उस समय ससुराल में पाँव रखा |


घूँघट में रहना
कम बोलना,ज्यादा सुनना
मुस्कुराना और सहना
सब कुछ सीखा |


गृहस्थी को संभाला
बच्चो को पढाया लिखाया
बहुओ और पोते पोतियों को
संभालते सँभालते
शैशव और यौवन दोनों बीत गये |


हाथो में मेहंदी लगाते-लगाते
बालो में मेहंदी लगाने के
दिन आ गये |


आज वो
अपने पोते पोतियों
के साथ बैठ कर
अपने बचपन को
फिर से जीने लगी है । 


डेंगा-पानी का खेल
गुड्डा -गुड्डियो का खेल
बरफ के गोले के लिए मचलना
बारिस की रिमझिम में भीगना |

 ये सब
सुनाते-सुनाते
उसके चहरे पर एक बार फिर
बारह वर्ष वाली बाली उम्र की
हँसी  लौट  आती है  | 

सुजानगढ़  
२५ जून, २०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Thursday, June 17, 2010

चन्दा मामा



चन्दा मामा आओ ना
साथ मुझे ले जाओ ना 
     बादल के घोड़े पर चढ़ कर
     मुझे घुमा कर लाओ ना। 

तारों के संग आँख मिचोली
मै खेल कर आवूंगा
     आसमान में ऊपर जाकर
     सारे जग को देखूंगा। 

रात चाँदनी में नाचूँगा
गीत ख़ुशी के  गाऊँगा 
     वापिस आते एक दुल्हनिया
     परी देश से लाऊँगा। 


सुजानगढ़
१७ जून,२०१०

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )


Wednesday, June 16, 2010

भिखारिन




विक्टोरिया में
मोर्निंग वाक करके
हम शर्माजी की
दुकान पर  पहुँचे।

सुबह के नाश्ते में
गर्म जलेबी और
समोसों के साथ
चाय का घूँट लेने लगे। 

तभी एक दुबली पतली
काया वाली औरत
एक कटी-फटी धोती में
हमारे सामने आकर
खड़ी हो गई।

वह कभी खुद को
कभी अपने अधमरे
बच्चे को ढकने का
प्रयास कर रही थी।  

टुकुर-टुकुर हमारी
तरफ देख रही थी
उसकी आँखों में एक
याचना थी। 

हमारे में कोई बोला 
कितनी बेशर्म है
सामने छाती पर
आकर खड़ी हो गई। 

हमने उसकी तरफ
तिरस्कार भाव से देखा
हटाने के लिए बचा-खुचा
उसकी तरफ बढ़ा दिया।

बच्चे को गोदी में
बैठा कर वो उसे प्यार से
माथे पर हाथ फेर कर
खिलाने लगी। 

हमने महसूस किया 
बच्चे को खिलाती हुयी वो
हमारी तरफ तृप्ति के भाव 
से देखने लगी। 



कोलकता
६ जून,२०१०

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Tuesday, June 15, 2010

बरखा आई .


घनघोर घटा काली घिर आई,
बहने     लगी   हवा   पुरवाई,
बादल  में   बिजली चमकाई,
मतवाली बरखा  ऋतु  आई,
                                छम छमा छम बरखा आई|

झम-झम कर बूंदे  छहराई,
सोंधी खुशबू  माटी से  आई,
भीग चुनरिया तन लपटाई,
महक  उठी  देह   महुआइ',.
                                छम छमा छम बरखा आई|

अमृतघट  प़ी धरती मुस्काई,
कोयल  ने मीठी तान सुनाई,
झूला  झूल   रही   तरुनाई,  
मीत  मिलन  की  बेला आई,
                                  छम छमा छम बरखा आई|

मेंढ़क ने  मेघ मल्हार लगाई,
इन्द्रधनुसी  छटा     लहराई.
मिटी    उमस  पवन  ठंडाई,
मतवाली बरखा ऋतु आई.
                                  छम छमा   छम बरखा आई|

पिहु पिहु पपिहा  ने धुन गाई,
कजली  खेतो  में लगी सुनाई,
मस्तानी      वर्षा     ऋतु  आई
झूम बदरिया घिर  घिर आई,
                                   छम  छमा  छम  बरखा आई|
सुजानगढ़
१५ जून,2010

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, June 7, 2010

आशाएं




रख भरोसा प्रभु चरणों में,           
              हमको  आगे बढ़ना है। 
जीवन  के  हर एक   पल को        
              हमें  ख़ुशी से जीना  है। 


राहें सीधी हो या टेढ़ी,                
               हँसना है मुस्काना है। 
संकट तो आते-जाते हैं,             
             इनसे क्या घबराना है। 


हिम्मत के बल आगे बढ़,             
       जीवन में खुशिया लानी हैं। 
आशाओं  के दीप जला कर ,       
                 रोशन राहें   करनी है। 


चाहे जितनी  हो बाधायें,              
               हमको चलते जाना है। 
दुःख से ही  सुख आता है,           
          जीवन का यही तराना है। 


जीते हैं मरने वाले ही,               
             दिल में यह विश्वास  रखें।  
हार गए तो भी क्या होगा,         
             दिल में जय की आश  रखें। 

सुजानगढ़
७ जून, २०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Thursday, June 3, 2010

मतीरो


धोरां री धरती रो मेवो
मीठो गटक मतीरो। 

हरी- हरी बेलां पर लागे            
                      जाणै पन्ना जड़िया।          
           धोरा मांई  गुड-गुड ज्यावै                  
                   ज्यूँ अमरित रा घड़िया।        
           
फोड़ मतीरो खुपरी खावे,                  
         लागे अमरित सो मीठो। 
     गरमी का तपता मौसम में,               
             ओ करे कालजो ठंडो। 

कुचर-कुचर ने खुपरी खावे,             
             मिसरी ज्यूँ  मीठो पाणी। 
भूख मिटावे -प्यास बुझावे,           
            गंगा जल  सो ठंडो पांणी। 


सुजानगढ़
३ जून,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )