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Saturday, February 6, 2016

बच्चे खो रहें हैं अपना बचपन

बच्चे खो रहें हैं अपना बचपन
अब वो नहीं खेलने जाते
मैदानों में, पार्कों में और गलियों में

अब वो नहीं देखने जाते
दशहरे, नागपंचमी और गणगौर
के मेले में

अब वो नहीं खेलते
गिल्ली डंडा, खोखो और कबड्डी
आपस में मिल-झूल कर

अब वो नहीं सुनते
नानी-दादी से किस्से-कहानियाँ
उनके पास बैठ कर

वो उलझ गए हैं
हंगामा, पोगो और टैलेंट हंट
के मायाजाल में

सिमट गया है उनका बचपन
टैब, मोबाइल और कम्प्यूटर
की स्क्रीन में

हरे-भरे मैदानों में खेलते
बच्चों को देखना लगता है अब
सपना ही रह जाएगा

तितलियों के पीछे दौड़ता
बचपन देखना लगता है अब
बीते जमाने की बात रह जाएगा।


( यह कविता स्मृति मेघ में प्रकाशित हो गई है। )