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Sunday, September 6, 2009

कबूतर को दाना






माँ अपने
कमरे में
रोज रात को
एक कटोरा भर कर
दाना रखती 


मुहें अंधेरे
उठ कर
छत पर
जाकर
कबूतरों को
दाना डाल आती

कभी
आराम-बीमार
हो जाती
तो हमें कहती
जाओ कबूतरों
को दाना डाल आओ

वो कौन से
तुम से माँगने आयेंगे
बेचारे बिन झोली के
फ़कीर हैं 

माँ के
जाने के बाद
ये काम
माँ की बहू
कर रही है

रोज सवेरे
उठ कर
छत पर जाकर
कबूतरों को दाना 
डाल आती है

कहती है
बेचारे बिन झोली के
फ़कीर है

और यही 
हमारी संस्कृति की
लकीर है।  


      कोलकत्ता
 ६ सितम्बर,२००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )