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Saturday, April 7, 2018

विरह वेदना

जुदा हो कर भी वो मेरे जहन में बसी है
विरह वेदना उसकी आज भी सत्ता रही है।

फूल सा दिल कुम्भला गया वो चली गई 
आँखें आज भी उसकी राह देख रही है।

हवा में उसके गुजरे पलों के नगमें घुले हैं
उसकी गुजरी हुई साँसें मिलने आ रही है। 

याद करता नहीं फिर भी, याद आ रही है
उसकी याद में, नयनों से प्रीत बह रही है।

वो तो आज भी मेरी सांसों संग बसी हुई है 
साँसों से ज्यादा तो उसकी यादें आ रही है। 

जीवन की संध्या में, सारी खुशियां खो गई
यादों की पीड़ा मन्दाकिनी सी बह रही है।


[ यह कविता "कुछ अनकही ***" पुस्तक में प्रकाशित हो गई है ]