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Friday, January 24, 2014

पिट्सबर्ग की एक शाम

                                                                              मैं कमरे में बैठा 
काँच की खिड़की से  
बाहर का
नज़ारा देख रहा हूँ। 

बाहर आसमान 
से गिरती धवल हिमराशि
काश के 
फूलों जैसी लग रही है। 

बीच-बीच में 
 रंग बदलते पेड़ों के
 पत्तों का 
शोर सुनाई पड़ रहा है। 

बगीचे में 
टिमटिमाते जुगनू
  खिड़की से 
बारबार टकरा रहें हैं। 

खरगोश 
रात के अँधेरे में 
 हिम से बचने 
झाड़ियों में छुप रहें हैं। 

दौड़ती सड़कें 
 बर्फ की चादर
ओढ़ कर 
खामोश हो रही है। 

एक चपल गिलहरी 
पेड़ के ऊपर 
अभी भी 
   फुदक रही है। 

\
( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )