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Tuesday, November 5, 2013

महानगर

यह महानगर है
यहाँ कुत्ते नहीं भोंकते
बिल्लियाँ रास्ता नहीं काटती
यहाँ बेकाबू गाड़िया दौड़ती है

तुम ठिठक कर
खड़े क्यों हो गये ?
सड़क पर जो दम तोड़ रहा है
उसे अभी-अभी सिटी बस ने कुचला है

अस्पताल पहुँचाने का
यहाँ कोई कष्ट नहीं उठाता
सभी ठिठकेंगे, देखेंगे और
निश्चिंत होकर आगे बढ़ जायेंगे
 
जब तक पुलिस आयेगी
घायल सड़क पर दम तोड़ देगा
यहाँ का यह आम नजारा है
यहाँ जीवन सबसे सस्ता है

लोग सकुशल घर पहुँचने के लिए
यहाँ मनौती मना कर
घरों से निकलते हैं
यह महानगर है। 


  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]