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Saturday, September 8, 2018

नारी सशक्तिकरण

                                                                  मैं अब नहीं बनना चाहती
अहिल्या की प्रस्तर प्रतिमा
जिसे कोई राम आकर
पांव लगाए। 

मैं अब नहीं बनना चाहती
घृतराष्ट्र की गांधारी
जो आँख पर पट्टी बाँध कर 
जीवन बिताए। 

मैं अब नहीं बनना चाहती
महाभारत की द्रोपदी
जिसे कोई धर्मपुत्र जुए मे
दाँव पर लगाए। 

मैं अब नहीं बनना चाहती
नल की दमयन्ती
जिसे उसका प्रेमी जंगल में 
 छोड़ कर चला जाए। 

मैं अब नहीं बनना चाहती
राम की सीता
जिसकी सतीत्व के लिए
अग्नि -परीक्षा ली जाए। 

मैं अब अबला नहीं
सबला बन जीना चाहती हूँ,
आत्मनिर्भर सशक्त नारी की 
 कहानी खुद लिखना चाहती हूँ। 



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )