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Friday, November 22, 2019

गरीबी को मिटाया जाय


 झारखण्ड के                                                            
आदिवासी इलाके में
भूख से परिवार की मौत। 

बिहार में 
कड़ाके की ठण्ड से 
सात लोगों की मौत। 

चिकित्सा के
अभाव में नवजात की
असामयिक मौत। 

समाचार पत्र में
इन खबरों का शीर्षक
सही नहीं लिखा गया था। 

परिवार की
मौत भूख से नहीं
गरीबी से हुई थी। 

उनके पास 
अनाज खरीदने के लिए
पैसे नहीं थे। 

सात लोगों 
की मौत ठण्ड से नहीं
गरीबी से हुई थी। 

उनके पास 
कपड़े खरीदने के लिए
पैसे नहीं थे। 

नवजात की मौत
बीमारी से नहीं
गरीबी से हुई थी। 

उनके पास 
दवा खरीदने के लिए
पैसे नहीं थे। 

यदि हम चाहते हैं कि
इस तरह की घटनाएं
 नहीं घटे तो हमें 
 गरीबी को मिटाना होगा। 

रुपये किलो
चावल बांटने या
मुफ्त में साइकिल
देने से काम नहीं चलेगा। 

हर हाथ को
काम देना होगा
देश में काम करने का
वातावरण बनाना होगा। 

घर बैठे पैसे दे कर
मुफ्त में अनाज बांट कर
वोट बैंक तो बनाया जा सकता है
मगर गरीबी नहीं मिटाई जा सकती। 

अकर्मण्य बनाने से अच्छा है
उन्हें कर्म करने के लिए
प्रेरित किया जाय
हाथों को काम देकर
गरीबी को मिटाया जाय। 


( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )