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Friday, March 26, 2010

हीया हीया हो


  


रात  चाँदनी
तारे चमके
चँदा बोला
हीया- हीया हो।

बिजली चमकी
बादल बरसा
मोर बोला
हीया -हीया हो।

कली   खिली
फूल हँसा
भंवरा बोला
हीया -हीया हो।

सावन आया
झूले डाले
कोयल बोली
हीया- हीया हो।

सूरज निकला
सर्दी भागी
बच्चे बोले
हीया -हीया हो।

घंटी बजी
छुट्टी हुयी
सब कोई बोले
हीया -हीया हो।




कोलकत्ता
२६ मार्च,२०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )