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Saturday, August 16, 2014

अब वह बात कहाँ ?




पहले थी मोहब्बते जिंदगी
अब वह बात कहाँ ?

सुबह-शाम घूमने जाते
हँस-हँस करके बातें करते
तोड़ फूल हाथों में देते
अब वह बात कहाँ ?

एक दूजे की राह देखते 
साथ बैठ कर खाना खाते
मनुहारों से भोजन करते 
अब वह मजा कहाँ  ?

शाम-सवेरे पूजा करते
भजन-आरती संग में गाते 
रागों की झंकार उठाते
अब वह समा कहाँ ?

जब भी हम फुर्सत में होते 
अपने मन की बातें करते 
पुनर्मिलन की इस जीवन में
अब वह घड़ी कहाँ ?

देश-विदेश घूमने जाते
एक दूजे के संग में रहते 
चाँद-चांदनी संग था अपना 
अब वह साथ कहाँ ?  

पहले थी मोहब्बते जिंदगी
अब वह बात कहाँ ?



 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]