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Saturday, July 26, 2014

आभास हो गया था मन को

आज मेरे साथ
जो घटनाएँ घट रही थी
उससे मेरा मन शशंकित था

सपने में भी आज मुझे
कुछ इसी तरह का आभास
पहले से ही हो गया था

कृष्ण की मूर्ति को 
पूजा में रखते समय
हाथ से उलटा रखा जाना

पूजा के बर्तनों को
मंदिर में रखते हुए
हाथ से छूट कर गिर जाना

आज कुछ अप्रत्याशित
घटित होने वाला है
यह उसी का पूर्वाभाष था

जीवात्मा जगत से
सुक्ष्म तरंगों के माध्य्म से
कोई सन्देश भेज रहा था

ब्रह्माण्ड में
कोई शक्ति विध्यमान है
जो पूर्वाभास करा देती है

कोई पृष्ठभूमि
तैयार हो रही है
यह संकेतो में समझा देती है

६ जुलाई २०१४ का
वह मनहुस दिन
मेरे जीवन में कहर बन कर आया

मेरी जीवन संगिनी 
को सदा-सदा के लिए
मुझ से छीन कर ले गया।


 [ यह कविता "कुछ अनकहीं ***" में छप गई है।]