Saturday, April 18, 2015

जो पल तुमने मेरे नाम किये

आज जब तुम मेरे संग नहीं हो
तुम्हारे साथ बिताये लम्हों की यादें ही
मेरे जीवन का एक मात्र सहारा है

मैं चाहता हूँ
उन यादों को जीवन में
सहज कर रखूं

कविता से आदर्श
दूसरा कोई विकल्प
इसके लिए नहीं होगा

जब तुम पराजगत में मिलोगी
मैं रख दूंगा तुम्हारी हथेलियों पर
उन्हें सहज कर

करूंगा तुम्हारा शुक्रिया अदा
उन पलों के लिए
जो पल तुमने मेरे नाम किये।









Wednesday, April 15, 2015

खुशियाँ रूठ गयी जीवन से

मुझ को सारा सुख देने में
तुमने जीवन सुख माना,
मेरी हर पीड़ा मुश्किल को
तुमने अपना दुःख माना
                         
                            जब से तुम बिछुड़ी हो मुझ से
                            खुशियाँ बिछुड़ गई जीवन से।

सच्ची सेवा और लगन  से
पूर्ण रूप तुम रही समर्पित,
हर पल मेरा साथ निभाया
जीवन सारा कर दिया अर्पित
                       
                         जब से तुम रूठी हो मुझे से
                          खुशियाँ रूठ गई जीवन से।

मुस्कान तुम्हारे अधरों की
मेरे जीवन में साथ रही,
प्रीत तुम्हारी अमृत बनके
गंगा जल सी सदा बही
                       
                              जब से दूर हुई हो मुझसे
                             खुशियाँ दूर हुई जीवन से।

सुषमा-सौरभ बिखरा कर
मेरा जीवन सफल बनाया
साथ दिया सुख-दुःख में मेरा
खुशियों का संसार सजाया
                           
                             जब से तुम निकली जीवन से
                             खुशियाँ निकल गई जीवन से।


















Wednesday, April 8, 2015

हो सके तो लौट आओ

आज पंद्रह महीने बीत गए,तुमसे बिछुड़े हुए
आँखें बिछी है राह में, हो सके तो लौट आओ।

                                                          प्रीत के पहले प्रहर में ही तुम तो बिछुड़ गई
    टूट गए संजोये ख्वाब,हो सके तो लौट आओ।  

चली गयी तुम,यादों का सिलसिला दे कर
बेक़रार है यह दिल, हो सके तो लौट आओ।         

तुम्हें ही सोचता, लिखता,गुनगुनाता रहता हूँ 
पुकारता रहता है मन, हो सके तो लौट आओ।

अश्रु ढुलकते रहते,तकिया भीगता रहता है,
जीवन के ढलान पर,हो सके तो लौट आओ।       


दिन यादों में और रात रोने में कट जाती है 
खोया रहता है मन, हो सके तो लौट आओ। 


                                                                                                                           









Monday, April 6, 2015

छलक पड़ती है आँखे

आज से
ठीक नौ महीने पहले
काल के क्रूर हाथों ने
तुमको छीन लिया था मुझ से

जब तक
तुम्हारा साथ था
भोर की उजली धूप की तरह
सुख लिपटा रहता था मुझे से

खुशियाँ सारी
रहती थी मेरी मुट्ठी में
हथेलियाँ छोटी पड़ जाती थी
थामने सुख

पारे की तरह फिसल गया
छूप गया है रूठ कर
वक़्त की झाड़ियों में सुख

याद आ रहा है
तुम्हारा हँसता चेहरा
गजल कहती
वो आँखे

दिवार पर लगी
तुम्हारी तस्वीर देख
छलक पड़ती है
मेरी आँखे।


कोलकाता
६ अप्रैल,२०१५