Wednesday, April 8, 2015

हो सके तो लौट आओ

आज पंद्रह महीने बीत गए,तुमसे बिछुड़े हुए
आँखें बिछी है राह में, हो सके तो लौट आओ।

                                                          प्रीत के पहले प्रहर में ही तुम तो बिछुड़ गई
    टूट गए संजोये ख्वाब,हो सके तो लौट आओ।  

चली गयी तुम,यादों का सिलसिला दे कर
बेक़रार है यह दिल, हो सके तो लौट आओ।         

तुम्हें ही सोचता, लिखता,गुनगुनाता रहता हूँ 
पुकारता रहता है मन, हो सके तो लौट आओ।

अश्रु ढुलकते रहते,तकिया भीगता रहता है,
जीवन के ढलान पर,हो सके तो लौट आओ।       


दिन यादों में और रात रोने में कट जाती है 
खोया रहता है मन, हो सके तो लौट आओ। 


                                               
                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




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