मैं अब
सयानों की तरह
चुप रहना चाहता हूँ।
जीवन की
धीरे-धीरे बुझती
लो को देखना चाहता हूँ।
अकेले
आगे की यात्रा की
तैयारी करना चाहता हूँ।
सुख-दुःख
धैर्य और लालच सब
साथ ले जाना चाहता हूँ।
पतझड़ में
झड़ते पत्तों की तरह
उड़ जाना चाहता हूँ।
शरीर छोड़
आत्मा के संग
चले जाना चाहता हूँ।
अनन्त में
जहां झिलमिलते हैं तारे
वहाँ जाना चाहता हूँ।