Thursday, June 30, 2016

सांझ सुहानी ढल गई

मन का आँगन सूना हो गया,जीवन वैभव चला गया
सुख गया है उर का निर्झर, सहपथिक भी चला गया।

साथ रह गयी यादें केवल, उजले पल सब चले गए 
खुशियां निकल गई जीवन से,सुन्दर सपने टूट गए।

याद तुम्हारी आती रहती, दिल तड़पता रातों में
मेरे मन की पीड़ा का अब, दर्द झलकता आँखों में।

रीत गया संगीत प्यार का, रुठ गई कविता मन की
यादों में अब शेष रह गई, सुधियां चन्दन के वन की।

बीत गया सुखमय जीवन,अन्तस् पीड़ा भर आई
  आँखों में अश्रु भर आए, याद तुम्हारी जब आई।

गीत अधूरे रह गए मेरे, मन की मृदुल कल्पना खोई  
जीवन पथ पर चलते-चलते, सांझ सुहानी ढल गई।






                                           [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]










Thursday, June 23, 2016

बुढ़ापा

तुम्हारे जाते ही
बिना निमंत्रण के
आहिस्ता-आहिस्ता
हौले-हौले
मेहमान बन आ धमका
मेरे पास बुढ़ापा

ढलने लगा चमकता तन
टूटने लगा मजबूत मन
डिगने लगा आत्मविश्वास
अवांछित होने का अहसास
कराने लगा है बुढ़ापा

घुटनों में दर्द
आँखों में धुंधलापन
कानों से ऊँचा सुनाई देना
दाँतों का एक-एक कर विदा होना
अंग-प्रत्यंग पर अपना असर
दिखाने लगा है बुढ़ापा

अपनों से ही
बात करने के लिए तरस जाना
चुप रह कर ही सब कुछ सुनना
एक खालीपन का अहसास
कराने लगा है बुढ़ापा

मेहमान आते है
दो-पांच दिन ठहर कर
चले जाते हैं

लेकिन यह तो इतना ढीठ है कि
अब जाने का नाम तक नहीं लेता
मेरे तन के साथ ही अब तो
जलेगा बुढ़ापा।






Monday, June 13, 2016

छोड़ मुझे तुम चली गई

     मेरे जीवन की राहों में
 बहार बन कर तुम आई,          
   मेरे जीवन के सागर में              
लहर-लहर पर तुम छाई।

   प्रीत तुम्हारी अमृत जैसी                                                    
  गंगा जल सी सदा बही,                                            
अधरों की मुस्कान तुम्हारी                                                    
 मेरे संग में सदा रही।                                           

   साँझ ढली मेरे जीवन में
    बिच राह तुम छोड़ गई,
साथ चले थे राह-सफर में
 अब राहे सुनसान हो गई।

सुख की सारी सुन्दर बातें                                                        
मेरे जीवन से निकल गई                                                      
 सूनापन है बिना तुम्हारे                                                     
 सारी खुशियाँ चली गई।                                                    

      रिश्ते सब अंजान हो गए
        जब से तुम परधाम गई,
अब न मिलेंगे किसी मोड़ पर
        छोड़ मुझे तुम चली गई।
       

     
     
                                              [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Monday, June 6, 2016

महाप्रयाण

६ जुलाई २०१४
असाढ शुक्ल पक्ष नवंमी 
रविवार का वह मनहूस दिन
जब तुमने महाप्रयाण किया

उस दिन से मेरी जिंदगी
कभी ख़त्म न होने वाली
एक अमावस की रात
बन कर रह गयी

आसमान में
लाखों तारे आज भी
टिमटिमा रहे हैं लेकिन
मेरे जीवन में अब
पूनम का चाँद
कभी नहीं चमकेगा। 

पूजा के दादी जी

मैंने पूजा से कहा-
सुबह के नौ बज रहे हैं
अब उठ जाओ
सारी रात पढ़ती रहती हो
आँखें खराब हो जाएगी

पूजा ने करवट बदलते हुए कहा-
दादाजी आप भी कैसे उठा रहे हैं
दादी जी की तरह
वो प्यारा सा गीत गाकर उठाइए ना
"म्हारी पोती बेगी सोवै
मोड़ी उठे रेकारो मत दीज्यो जी" *

मैंने कहा-
मुझसे नहीं गया जाता
तुम्हारी दादी की तरह गीत
कहाँ से लाऊँ मैं वैसी सुरीली राग

मेरा गला भर आया
आँखें डबडबा आई
मैंने आँखों को अँगुलियों से दबाया
कहीं आँखो में आये आँसूं
पूजा पर न टपक पड़े।


*बेटी जब ससुराल जाती है तो राजस्थानी भाषा में एक गीत गया जाता है, ये उसी के बोल है।  इस गीत में ससुराल पक्ष से निवेदन किया जाता है कि -- हमारी बेटी जल्दी सोती है और देर से उठती है ,आप उसे कुछ भी मत कहना। पूजा के दादी जी उसे यह गीत सुना कर ही उठाया करती थी।