Tuesday, January 31, 2012

होली आई रे

बाजे ढोल मृदंग आज
फिर होली आई रे  |
तन मन  हर्षित हुआ  आज
फिर फागुन  आयो रे  ||

चुनर हो गई लाल आज
फिर  होली आई रे  |
भीजे कंचन देह आज
फिर फागुन आयो रे  ||

बरसे रंग गुलाल आज
फिर होली आई रे |
जित देखो तित  धूम आज
फिर  फागुन आयो रे ||

मन वृन्दावन बना आज
फिर होली आई रे  |
मिल कर रास रचाओ आज
फिर फागुन आयो रे  ||

(यह कविता "कुमकुम के छींटे"  पुस्तक में प्रकाशित हो गयी  है )

अच्छी बातें

प्यार भरो बच्चों के दिल में
ये सावन बन कर बरसेगें 

पढ़ा लिखा विद्वान बनाओ
ये जग रोशन नाम करेंगे

मीठी वाणी इनसे बोलो
हँस-हँस कर बात करेंगे ये।

दिल में इनके दीप जलाओं
रोशन राह करेंगे ये ।

गीत भरो तन-मन में इनके
चहक-चहक गायेंगे ये ।

सच्चे सुख की राह दिखाओ
धरती स्वर्ग बनायेंगे ये ।

प्यार से इनको गले लगाओ 
नेह सुधा बरसायेंगे ये ।

नन्द यशोदा बन कर पालो
कृष्ण बन दिखलायेंगे ये ।







Wednesday, January 25, 2012

मानवी बनो

गंधारी आज
अपनी आँखों  पर
बन्धी पट्टी को तुम खोलो।

तुम असहाय नहीं हो
तुम निरुपाय नहीं हो
तुम अबला नहीं सबला हो।

आज का घृतराष्ट्र जन्मांध नहीं है
वो केवल अन्धे होने का
नाटक मात्र कर रहा है।

तुम्हे अपनी सम्पति समझ
कर छलता जा रहा है
तुम्हे भोगता जा रहा है।

ईक्कीसवी सदी
तुम्हे निमंत्रण दे रही है
मानवी बनने का आमंत्रण दे रही है।

उठो ! अपने आप को पहचानो
तुम्हे मौन की चट्टान को तोडने और
तूफानी धारा को मोड़ने का निमंत्रण दे रही है।

तुम्हे एक नया इतिहास रचना होगा
आँचल में दूध और आँखों में पानी
की कहानी को बदलना होगा।

तुम्हे आगे बढ़ कर भ्रस्टाचार का
मर्दन करना होगा
विजय का नर्तन करना होगा।

जब तुम्ह हिम्मत करोगी
तुम्हारी जीत का शंख बजेगा
मिटटी का कण-कण जयघोष करेगा।

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )







Thursday, January 19, 2012

अपनी संस्कृति

खुबसूरत हाइवे,
तेज रफ़्तार से चलती गाड़ियाँ
गाड़ियों में चाय-काफी पीते हुए
मौजमस्ती करते अमरीकी। 

बीच और डिस्को की मस्ती
वीकेंड पर घूमना-फिरना
किशोरावस्था में फ्रेन्ड के साथ रहना
मनमानी का जीवन जीते अमरीकी ।                          

मूंगफली और बादाम एक भाव
शराब और पानी एक भाव,
हेनरीज-कोसको-वालमार्ट में 
खरीददारी करते अमरीकी।                                                                                                          

जाते हैं हमारे बच्चे भी
पढ़ाई के लिए अमेरिका,
फिर ढूंढते है वहाँ नौकरी और
पाकर जीवन-साथी बन जाते है अमरीकी।                                                                 

धीरे-धीरे बस जाता है अमेरिका
उनकी साँसों में,उनके जीवन में,  
फिर भी वो नहीं भूलते अपने  देश को
अपनी संस्कृति को, बन कर भी अमरीकी।                                                  


तीज-त्योहारों पर पहनते  हैं
भारतीय पोशाकें,सजाते है आरती के थाल
करवाते हैं पंडित से पूजा-पाठ
प्रसाद को चाव से खाते है अमरीकी ।                                                    

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, January 16, 2012

संदेशो (राजस्थानी कविता )

घर  स्यूं
संदेशो आयो,
अबकाळै बिरखा
मोकली है।

काती सरा पर
आया रहीज्यो,
रामजी री मैर 
समुं सैंजोर है।

हरी करस
घोटां पोटां तो बाजरी,
खारिये मान मोठ ओ
कङयॉ सूदो गुंवार उबौ है।

काकड़ी मतीरा की बेलां
चियां 'र फुलडा स्यूं
लड़ालूम हो राखी है 
साख सवाई है।

टाबरिया भी ओळृं करे
टिकट कटा 'र राखिज्यो ,
काती सरा पर 
आया रहीज्यो।


(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Friday, January 13, 2012

धौली धौली मूच्छया

माँ गुमारियै में भरयोड़ो पालो
रख देती गाय के आगे
भर खारियो,

दे'र नाणो
बैठ ज्याती दुहण ने
ले'र गोवणियो,

भर देती
दुयोङा दूध री गिलास
पी ज्यातो ऊभो ही गटागट,

दे मुठ्या मे थूक 'र
भाग ज्यातो साइना सागे
खेलण न फटाफट,

झागला स्यूं
बण ज्याती होटा पर
धौली धौली  मूच्छया,

खेळतो कबड्डी
जणा ठोकतो ताळ ओ मरोड़तो
धौली धौली मूच्छया।

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )








कुमकुम का छींटा |

आदमी रो आदमी स्यू
जद  विसवास  उठ्ग्यो
जणा सोच्यो क्यूँ  ने  भाटै पर
विसवास  करयो जावै |

कोनी बिसवास हुवे
निराकार में
राखणो हुसी
आकार मुंडागे |

थरप दियो भाटै ने
देवता बणाय ओ
मानली घङ्योङी मूरत में
विसवास री खिमता |

चढावण लागग्यो
मेवा 'र मिस्ठान
देवण लागग्यो
कुमकुम का छींटा |

भाटो बण देवता  पुजीजग्यो
भोलो जीव पतीजग्यो |



(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

Monday, January 9, 2012

लाल बत्ती

महानगरो के चौराहों पर
गाड़ी रुकते ही
अक्सर आ जाते हैं
भीख माँगते बच्चे।

चार- पाँच साल के
अर्धनग्न,मैले कपड़े
नंगे  पाँव  दौड़ते
हाथ फैलाए बच्चे।  

कातर भाव से
हाथ को मुँह के पास 
ले जा कर खाली पेट
दिखाते बच्चे।

ललचाई आँखों से
दो रुपये दे दो बाबूजी
की रटलगाकर
भीख माँगते बच्चे।

पैसे मिलते ही
खुश हो कर एक से
दूसरी गाड़ी की तरफ
लपकते हुए बच्चे।

हरी बत्ती जलते ही
किनारे की तरफ दौड़ 
अगली लाल बत्ती होने
का इन्तजार करते बच्चे।

यही है हमारी
चौसठ वर्ष की
प्रगति को दिखाते
भविष्य के प्रतीक बच्चे ।
     

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )













Friday, January 6, 2012

मिठास

घर के बड़े-बुड्ढे
समय-समय पर
पीते रहते  है
कुछ कड़वा,
कुछ तीखा,
ताकि परिवार के
रिश्तों में बची
रह सके मिठास ।

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" पुस्तक में प्रकाशित  हो गयी है )


ताजमहल


मैंने भावुक हो कर कहा -
काश ! मै  भी तुम्हारे लिए
एक ताजमहल बनवाता।

पत्नि ने गंभीर हो कर कहा-
कागज़ की संगमरमरी देह पर
मेरे लिए लिखी तुम्हारी कवितायेँ 
सौ ताजमहलों से भी
बढ़ कर खूबसूरत है।


(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )


Thursday, January 5, 2012

टमरक टूं, टमरक टूं,(राजस्थानी कविता )

एक कमेड़ी
बैठ खेजड़ी
घोळ " र  मिसरी
बोली यूँ -
टमरक टू - टमरक टू

एक चिङकली
बैठ बोरड़ी
घोळ"  र मिसरी
बोली यूँ -
चीं चीं चीं - चूं चूं चूं 

एक कबूतर
बैठ नीमड़ी
घोळ" र  मिसरी 
बोल्यों यूँ -
गुटर गूं - गुटर गूं

एक कोयलड़ी
बैठ पींपली
घोळ" र मिसरी
बोली यूँ -
कुहू कुहू -कुहू   कुहू    

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित   है )