Wednesday, January 25, 2012

मानवी बनो

गंधारी आज
अपनी आँखों  पर
बन्धी पट्टी को तुम खोलो।

तुम असहाय नहीं हो
तुम निरुपाय नहीं हो
तुम अबला नहीं सबला हो।

आज का घृतराष्ट्र जन्मांध नहीं है
वो केवल अन्धे होने का
नाटक मात्र कर रहा है।

तुम्हे अपनी सम्पति समझ
कर छलता जा रहा है
तुम्हे भोगता जा रहा है।

ईक्कीसवी सदी
तुम्हे निमंत्रण दे रही है
मानवी बनने का आमंत्रण दे रही है।

उठो ! अपने आप को पहचानो
तुम्हे मौन की चट्टान को तोडने और
तूफानी धारा को मोड़ने का निमंत्रण दे रही है।

तुम्हे एक नया इतिहास रचना होगा
आँचल में दूध और आँखों में पानी
की कहानी को बदलना होगा।

तुम्हे आगे बढ़ कर भ्रस्टाचार का
मर्दन करना होगा
विजय का नर्तन करना होगा।

जब तुम्ह हिम्मत करोगी
तुम्हारी जीत का शंख बजेगा
मिटटी का कण-कण जयघोष करेगा।

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )







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