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Saturday, April 6, 2019

ठगिनी बयार

बसंत आया मन हर्षाया
प्रकृति करे सोलह सिंगार,
धानी चुनरिया ओढ़े धरती
मद्धम - मद्धम बहे बहार। 

बागों में अमुआ बौराया
झूम उठी सरसों कचनार,
महुआ का भी तन गदराया
लाया बसंत अनन्त बहार। 

 पायल थिरके चुनर लहरे 
मचली फागुन की फगुआर,
कुहू -कुहू बोले कोयलियाँ 
बागों में छाई बसंत बहार। 

तन गदराया मन अकुलाया 
प्रकृति करे प्रणय मनुहार,
मधुकर चूमे कलियों को
ठगिनी बहने लगी बयार।


 ( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )