Showing posts with label टर्मिनल. Show all posts
Showing posts with label टर्मिनल. Show all posts

Friday, November 8, 2013

टर्मिनल


भाग-दौड़ भरी 
जिंदगी में परिवार 
बिखरते जा रहे हैं 

सभी इतनी तेजी से 
दौड़ रहे है कि 
मुड़ कर देखने का भी 
समय नहीं है

जिंदगी को जीवो 
लेकिन इतनी रफ़्तार 
से भी नहीं कि सब कुछ  
पिछे छूट जाए

दूरियां जीतनी तेजी से 
तय की जायेगी  
फासले उतने ही 
बढ़ते जायेगें  

वेग कि भी एक 
मर्यादा होनी चाहिए 
रुकने के लिए भी एक 
टर्मिनल होना चाहिये

साल भर में एक बार
परिवार कि सभी गाड़ियाँ
एक साथ आकर
ठहरनी भी चाहिये।




  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]