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Friday, April 15, 2016

धर कूंचा धर मंजलां रै (राजस्थानी कविता)

बाळू म्हारी सोने री खान रै
इरो घणो करां म्है गुमान रै
आतो धोरा री मुसकान रै
निपजै मीठा बोर मतीरा रै
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळु  बाजरियाँ लहरावे रै
काचर लौट-पौट हो ज्यावै रै
आतो कोसा-कोस उड़ ज्यावै रै
जद चाळै बायरो झिणो रै
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळू मैहके बिरखा मांई रै
जद भरयो भादवो गाजे रै
आतो घणी सोवणी लागै रै 
जद चौमासे खैती निपजै रै
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।

बाळु उंदाळे री रमझोळ रै
चालै आंध्यां घणी खेंखाती रै
आतो पसरै कोसां कोस रै
भर दै घर आंगणा गौर रै 
बैवे धर कूंचा धर मंजलां रै।





Thursday, March 20, 2014

फागण आयो (राजस्थानी कविता)

फागण आयो रै
साथीड़ा थारी याद सतावै रै
फागण आयो रै

गळी -गळी में फाग टोलियाँ
हिलमिल होली गावै रै
अवधपुरी में दशरथ नंदन
रंग बरसावै रै, फागण आयो रै

हो हो फागण आयो रै
साथीड़ा थारी याद सतावै रै
फागण आयो रै

गळियाँ मांय गुलाल उड़त है
सज गयी मथुरा नगरी रै 
कान्हा के संग फाग खैलबा
राधा आई रै, फागण आयो रै

हो हो फागण आयो रै
साथीड़ा थारी याद सतावै रै
फागण आयो रै

झर-झर बरसे रंग केसरी
बरसाणे-नंदगांव रै
छप्पन भोग छके मनमोहन
खूब लूंटावै रै, फागण आयो रै

हो हो फागण आयो रै
साथीड़ा थारी याद सतावै रै
फागण आयो रै

बरसाणैं री गुजरया ओ
नंदगांव रा ग्वाल रे
नाचै गावै झूमै सारा
रंग बरसावै रै, फागण आयो रै

हो हो फागण आयो रै
साथीड़ा थारी याद सतावै रै
फागण आयो रै

ग्वाल-बाल संग कृष्ण कन्हैया
हिलमिल रास रचावै  रै
ढोल-मृदंग मजीरा बाजै
करै ठिठोली रै, फागण आयो रै

हो हो फागण आयो रै
साथीड़ा थारी याद सतावै रै
फागण आयो रै।



[ यह कविता  "एक नया सफर " में प्रकाशित हो गई है। ]







Tuesday, October 22, 2013

कुदरत रो खेल (राजस्थानी कविता)

एक सी तो माटी
एक सी बैवे पून
एक सो तपै तावड़ो
मूळ मांई बैवे एक सो पाणी

फेर ए न्यारा-न्यारा स्वाद
कठै स्यूं निपज्या
कियां हुयो ओ अचरज ?

दाड़मा"र मौसमी
आम "र अंगूर
काकड़ी"र मतीरा
न्यारा-न्यारा रूप"र सुवाद

मिनख र समझ
माईं नीं आवै ओ खेल
सारो कुदरत रो खेल
कठै कांई निपजा देवै 

समझ एकलो  सिरजनहार
सिरजनहार री खिमता
कुण समझ सक्यो
अर कुण समझ पावैळो।




[ यह कविता  "एक नया सफर " में प्रकाशित हो गई है। ]



Wednesday, June 15, 2011

धौरावाळो देश (राजस्थानी कविता)

                                  

                                         सगळा रौ शिरमौर म्हारो धौरावाळो देस जी 

सालासर मे बालाजी रो मेळो लागै भारी जी
खाटूवाला श्याम धणी ने सारी दुनिया ध्यावै जी 
मेहंदीपुर रे बालाजी रे जात झङूला लागै जी
रामापीर ने रामदेवरा सगली जातां धौके जी  

                                           सगळारौ शिरमौर म्हारो धौरावाळो देस जी। 

श्रीनाथ में गोविन्दजी रे छप्पन भोग लगावै जी
झुंझुनू में राणी सती रे चून्दङ भक्त चढ़ावै जी 
रणकपुर में जैनमंदिर री शोभा अति विशाल जी
देशनोक में करनी  माँ रा दर्शन प्यारा लागै जी 

                                           सगळारौ शिरमौर म्हारो धौरावाळो देस जी। 

हवामहल ओ जंतर- मंतर जयगढ़ किला जयपुर जी 
सूफी संत री दरगाह प्रसिद्ध अनासागर अजमेर जी   
जोधपुर रो किलो भारी उम्मेद भवन मंडोर जी
उदयपुर झीलां की नगरी गढ़ लूंठो चितौड जी  

                                          सगळारौ शिरमौर म्हारो धौरावाळो देस जी।  

हल्दीघाटी वीरां री भूमि विजय स्तम्भ गर्वीलो जी
तीर्थराज पुष्कर में नामी बिरमा जी रो मंदिर जी
आबू के पहाङां में ऊँचो दिलवाडा रो मंदिर जी
उदयपुर में एकलिंगजी गणपति जी रणथम्बोर जी 

                                              सगळारौ शिरमौर म्हारो धौरावाळो देस जी। 


कोलकत्ता            
१४ जून,२०११

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

Saturday, October 23, 2010

पिया मिलन री रुत आई (राजस्थानी कविता)





मालण करदे म्हारा सोळा सिणंगार ऐ
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री 

चंपा रे फूलां रो बणवादे म्हारो गजरो ऐ
चोटी तो गुथंवा दे बेला फुल री 
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री 

नौलख तारां स्यूं जङवा दे म्हारी कांचली ऐ
टूकी तो लगवा दे सूरज-चाँद री
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री 

 इंद्रधणक रे रँगा स्यूं रंगवादे म्हारी चुनडी ऐ
गोटा में लगवा दे आभा बिजली री 
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री  

कजरा रे बादल रो सरवादे म्हारे काजलियो ऐ
टिक्की तो लगवा दे धूजी नखत री
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री|

चन्द्र -किरण रो बनवादे म्हारो चुड़लो ऐ
सूरज री किरणा सूं नोलख हार री
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री। 


कोलकत्ता
२२ अक्टुम्बर,२०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )