Saturday, October 23, 2010

पिया मिलन री रुत आई





मालण करदे म्हारा सोला सिणंगार  ऐ,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |


चंपा रे फूलारो  बणवादे म्हारो गजरो ऐ,
चोटी तो गुथंवादे बेला  फुल  री ,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |

नौलख तारा सें जङवा  दे म्हारी कांचली  ऐ,
टूकी तो  लगवादे सूरज - चाँद री,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |

 इंद्रधणक के रँगा में  रंगवादे म्हारी  चुनडी  ऐ,
गोटा में लगवादे आभा बिजली री ,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री  |


कजरारे बादल को सरवादे म्हारे काजलियो  ऐ,
टिक्की तो लगवादे धूजी नखत  री,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |

चन्द्र -किरण को बनवादे म्हारो चुड़लो ऐ,
सूरज की किरणा सूं नोलख  हार री,
म्हारे पिया मिलन री रुत आई री |


कोलकत्ता
२२ अक्टुम्बर,२०१०

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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