Friday, December 27, 2013

मधुर मुस्कान




एक बरस की हुयी आयशा
अब करती हर दम शैतानी,
अगड़म-बगड़म भाषा बोले
नहीं समझ में वह आती।

पानी उसको अच्छा लगता
बाथिंग टब में नहाती है
फिर चाहे कितना बहलाओ
बाहर नहीं निकलती है।

बड़े शौक से झूला झूले 
निचे नहीं उतरती है
पिज़ा,मैगी और पकौड़ी
बड़े चाव से खाती है।

छुपा-छुपी खेल खेलना
उसको प्यारा लगता है,
उसकी इन अदाओं पर
सारा घर खुश हो जाता है।

हम तो बैठे दूर बहुत है
मोबाईल पर बाते होती
मम्मी कहे प्रणाम करो
हाथ जोड़ जय करती।

सबकी प्यारी राजदुलारी
करती अपनी मनमानी,
मम्मी आँख दिखा कहती
अब बंद करो अब शैतानी।

२८ नवम्बर २०१३ को प्यारी आयशा एक साल को हो गयी। 

Friday, December 13, 2013

सावण आयो रे (राजस्थानी)

घणो सौवणो सावण लागे
सौणा तीज तिवांर रे
उमट कळायण बरसै बादळ
मन हरसावै रे
सावण आयो रे

ऊँचा डाळै हिंडो घाल्यो
सखियाँ हिंडो हिंड रे
घूँघट मंस्यू पळका मारै
लड़ली लुमाँ झुमाँ रे
सावण आयो रे।

सोन चिड़कल्यां करै कई किळोळा
गीत पपीहा गावै रे
पीऊ-पीऊ कर बोले मोरियो
छतरी ताणे रे
सावण आयो रे।

फर-फर करती उड़े चुनड़ी 
पवन चले पुरवाई रे  
झिरमिर-झिरमिर मैहा बरसे 
गौरी मूमल गावै रे 
सावण आयो रे।
          
मैह मोकळो अबकी बरस्यो
जबर जमानो हुसी रे
हळिया ने हाथा में पकड़्यां
छेलौ तेजो गावै रे
सावण आयो रे।

कर सौलह सिणगार गोरड़ी
पिंडो पासण चाळी रे
ऊँचा बैठो सायबां
प्रीत करे मनवार रे
सावण आयो रे।






म्हारो गाँव (राजस्थानी)


भायळा सागे गुवाड़ में
गेड्या दड़ी खेळता
चाँद के सैचन्नण चांनणै
लुक मिंचणी खेळता।

भूख लागती जणा 
कांदो रोटी खावंता 
ऊपरस्यूँ भर बाटको
छाछ-राबड़ी पीवंता। 

पौशाळ में पाटी बड़ता स्यूं
बारखड़ी लिखता
छुट्टी हुयां स्यूं पेली सगळा
पाड़ा बोलता।

संतरे वाली फाँक्या
आपस में बाँट र खांवता  
दूध री गिलास मलाई
घाळ र पींवता । 

जाँवण्या भरी रेंवती
दूध अर दही स्यूं
पौल भरी रेंवती  
काकड़ी र मतीरा स्यूं।

सियाळा में पड़ती ठंड
जणा सुहाती तावड़ी
थेपड़यां थापण आंवती
मांगीड़ै री डावड़ी।

गोबर का गारा स्यूं लीपता
घर का आंगणा
होळी-दिवाळी मांडता
गेरू-हिरमच का मांडणा।







Sunday, December 1, 2013

पुल पर जड़े सैंकड़ो ताले



पिट्सबर्ग (अमेरिका ) सिन्ले पार्क ब्रिज का लम्बा पुल... पुल पर का यह दृश्य...सैंकड़ो ताले लटक रहे है।  बहुत समय से देख रहा हूँ।  जब भी घूमने के लिए निकलता हूँ, इस पुल को पार करते -करते विचार मन में आने लगते है।  क्या सचमुच यूँ पुल पर अपने नाम का ताला जड़ कर चाभी पानी के हवाले कर के विश्वस्त हुए लोग जिंदगी भर साथ रहेंगे। क्या आज भी सचमुच उनकी मान्यता ने उन्हें कभी न ख़त्म होने वाला साथ-- उपहार स्वरुप दिया होगा--- या जीवन की विडम्बनाओं से जूझते हुए कहीं अलग थलग सी कोई कहानी होगी उनकी... कौन जाने!
 
बहुत प्यारा सा कांसेप्ट है, ताले पर अपना नाम अपने प्रिय के नाम के साथ लिख कर यूँ पुल पर टांक दिया जाए और चाभी हमेशा के लिए बहती धारा के हवाले कर दी जाय।  फिर न कभी मिलेगी चाबी और न कभी खुलेंगे ताले, न कभी जुदा होंगे दो लोग...! काश ऐसा ही आसान होता जीवन का यह खेल। ताले चाभी के खेल सा सरल होता जीवन...

Friday, November 29, 2013

बर्फानी हवा



आओ बैठो
खिड़की के पास 
देखो बाहर का नजारा 
  बर्फ के फोहें उड़ रहे है हवा में
   चाँदी का बर्क बिछ गया है धरा पर। 

 खोल दो खिड़की 
आने दो बर्फीली हवा को
फिर न जाने कब मौका मिले
नयनो से समेटो इस सौंदर्य को
और सुनो बर्फानी हवा के संगीत को।

सामने के लॉन ने
ओढ़ली चाँदी की लिहाफ
सड़क पर आकर सो गयी है हिम
चारो तरफ बिखरे पड़े है हीरक कण
कारो की कतारो पर जा बैठी है बर्फ।

चमक रहे हैं 
 गिरजाघरों के कँगूरे 
स्कूल से घर लौटते बच्चे
फेंक रहे है एक दूजे पर गोले
प्रकृति का अदभुत नजारा है यह।

पेड़ो कि टहनियों
पर पडी बर्फ हवा के
झोंकों से गिर रही है निचे
पंछी कोटरों में दुबक गये हैं
गिलहरियां फुदक रही है बर्फ में।

  
आओ बैठो
एक-एक गर्म चाय
के साथ बर्फ के इन फाहों से
ढाई अक्षर की एक कविता बनाये
   इस बर्फानी हवा को आज जी भर जीये। 

  

  



Sunday, November 24, 2013

आभार प्रभु आपका



हे करुणाकर
मै आपकी करुणा
   पाकर धन्य हो गया प्रभु ! 

मै निर्मल मन से
करता रहा आपसे प्रार्थना
हर समय आपका नाम जपता रहा 
कहता रहा अपने मन की बात आपको प्रभु !

सुबह शाम आपके
चरणो में अश्रु सुमन समर्पित
करता रहा और कातर स्वर से कहता रहा
सुशीला को स्वस्थ करो प्रभु !

हे अन्तर्यामी
अपरिमित दया आपकी 
जो स्वीकार किया आपने मेरा आग्रह 
कर दिया सुशीला को स्वस्थ और निरोग प्रभु !

आज आपने मेरी
अभिलाषा को पूर्ण कर दिया
जीवन में फिर मधुमास ला दिया
  सब कुछ आपकी अहेतुकि कृपा प्रभ ! 







Saturday, November 23, 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम



हे मर्यादा पुरुषोत्तम राम
सीता से यही तो अपराध
हुवा कि उसने आपसे
स्वर्ण मृग माँगा।

वो भी इसलिए कि राम
की पर्णकुटी सुन्दर लगे
राम स्वर्ण मृगचर्म पर
बैठ सके ।

राज्य के सुखो को त्याग
सीता आपके साथ वन गयी
क्या इस अपराध के लिए
यह त्याग कम था ?
ने 
 सीता की
अग्नि परिक्षा ली
क्या यह स्त्रीत्व का
अपमान नहीं था ?

एक रजक के कहने से
आपने आश्वप्रसवा सीता
को निर्वासन दे डाला
क्या यही पति धर्म था ?

आपकी हृदयहीनता से दुःखी
सीता धरती में समा गयी
क्या यह नारी जाति का
अपमान नहीं था ?

राम!इतिहास के पन्नो में भले ही
आप "मर्यादा पुरषोत्तम" बने रहे
लेकिन सीता के साथ आप
न्याय कभी भी नहीं कर सके।








Tuesday, November 12, 2013

प्यार की पराकाष्ठा



जो मेरा है वो
तुम्हारा है 
और जो तुम्हारा है 
वो मेरा है। 

तुम्हारा दुःख मेरा दुःख 
मेरा सुख तुम्हारा सुख। 

दोनों एक दूजे  के 
सुख-दुःख में शामिल। 

कई अनमोल सौगाते  
एक दूजे की 
एक दूजे के पास। 

गात अलग 
लेकिन मन एक। 

मेरे मन कि बात 
अनायास निकल पड़ती है  
तुम्हारे मुख से। 

और तुम्हारे मन कि बात 
निकल आती है
मेरे होठों से। 

सब कुछ समाहित है
एक दूजे का 
एक दूजे में। 

यही है प्यार की
पराकाष्ठा 
मेरा प्यार, तुम्हारा प्यार। 

Monday, November 11, 2013

मेरी चाहत है

मेरी चाहत है
तोड़ लाऊं मेहंदी के पत्ते
लगाऊं चटक रंग तुम्हारी
हथेलियों पर और 
सजाऊं तुम्हे। 

मेरी चाहत है 
समंदर से चुन लाऊं 
मोतियों वाली सीपियाँ 
और बना कर सुन्दर हार
पहनाऊं तुम्हे।  

मेरी चाहत है 
बगीचे में जाकर 
चुन लाऊं बेला के फूल 
और बना कर गजरा 
सजाऊं तुम्हे।  

मेरी चाहत है 
इंद्रधनुष के रंगो में
रंगाऊं रेशम की चुन्दडी
और लगा कर चाँद-सितारे
औढ़ाऊं तुम्हे।





Friday, November 8, 2013

टर्मिनल


भाग-दौड़ भरी 
जिंदगी में परिवार 
बिखरते जा रहे है। 

सभी इतनी तेजी से 
दौड़ रहे है कि 
मुड़ कर देखने का भी 
समय नहीं है। 

जिंदगी को जीवो 
लेकिन इतनी रफ़्तार 
से भी नहीं कि सब कुछ  
पिछे छूट जाए।

दूरिया जीतनी तेजी से 
तय की जायेगी  
फासले उतने ही 
बढ़ते जायेंगे। 

वेग कि भी एक 
मर्यादा होनी चाहिए 
रुकने के लिए भी एक 
टर्मिनल होना चाहिये।

साल भर में एक बार
परिवार कि सभी गाड़ियाँ
एक साथ आकर
ठहरनी भी चाहिये। 

Tuesday, November 5, 2013

महानगर

यह महानगर है
यहाँ कुत्ते नहीं भोंकते
बिल्लियाँ रास्ता नहीं काटती
यहाँ बेकाबू गाड़िया दौड़ती है।

तुम ठिठक कर
खड़े क्यों हो गये ?
सड़क पर जो दम तोड़ रहा है
उसे अभी-अभी सिटी बस ने कुचला है।

अस्पताल पहुँचाने का
यहाँ कोई कष्ट नहीं उठाता
सभी ठिठकेंगे, देखेंगे और
निश्चिंत होकर आगे बढ़ जायेंगे।
 
जब तक पुलिस आयेगी
घायल सड़क पर दम तोड़ देगा
यहाँ रोज सकुशल घर पहुँचने के लिए
लोग मनौती मना कर घर से निकलते है।

यहाँ का यह आम नजारा है
आदमी के जीवन की कीमत
यहाँ कीड़े-मकोड़े के बराबर है
यह महानगर है।







Friday, November 1, 2013

जीवन की यादे

जीवन भी
धूप-छांव कि तरह
कितने रंग बदलता है।

कभी सुख
तो कभी दुःख
कभी ग़म तो कभी ख़ुशी।

कभी दोस्त
तो कभी अजनबी
कभी सुदिन तो कभी दुर्दिन।

नदी की तरह बहता है जीवन
पुराने बिछुड़ते रहते है
नए मिलते रहते है।

जो आज हमारा है
कल किसी और का हो जाता है
सब कुछ बदलता चला जाता है।

रह जाती है केवल चंद यादे
वो यादें जो जीवन के अंत तक
साथ निभाती है।






Tuesday, October 29, 2013

आयशा बड़े कमाल की



नौ महीने की हुई आयशा
खाटू-सालासर चली गयी
बाल कटा कर भेंट चढ़ादी 
जय कन्हैया लाल की
आयशा बड़े कमाल की।

रात-रात भर गरबा देखा
थकने की कोई बात नहीं
दोनों हाथो में लेकर डांडिया
सबके साथ धमाल की
आयशा बड़े कमाल की।

घूम-घूम कर पूजा देखी
गली-मुहल्ले पंडाल की 
फूलो सी चमकाए आँखे 
देख चमक पंडाल की
आयशा बड़े कमाल की।

घर का कोना-कोना छाने
चिमट्टी बड़े कमाल की
किचन में जब भी जाती
शामत आती थाल की
आयशा बड़े कमाल की।

वैष्णो देवी के दर्शन कर  
कश्मीर घूमने चली गयी
मम्मी संग घोड़े पर बैठी 
नानाजी को बनाया पालकी
आयशा बड़े कमाल की ।



 

आयशा अपने नानाजी एवं मामाजी के संग माता वैष्णो देवी के दर्शनार्थ। 




Tuesday, October 22, 2013

कुदरत रो खेल (राजस्थानी कविता)

एक सी तो माटी
एक सी बैव पून
एक सो तप सूरज
मूल में बेव एक सो पाणी।

फेर ए न्यारा
न्यारा स्वाद
कठे स्यूं निपज्या
कियां हुयो ओ अचरज ?

दाड़मा र मौसमी
आम र अंगूर
काकड़ी र मतीरा
न्यारा-न्यारा रूप र सुवाद।

मिनख र समझ
में नहीं आवै ओ खेल
सारो कुदरत रो खेल
कठै कांई निपजा देव।

समझ केवल सिरजनहार
सिरजनहार री खिमता
कुण समझ सक्यो
अर कुण समझ पावळो।


Sunday, October 20, 2013

Oh Great donor

Oh, Life Giver, it is you I've come to know,
So in your honor, I bow my head this low.

You passed on your organs
While landing at heaven's portal,
Oh this path of goodness
You've become immortal.

You sacrificed your kidneys
So someone could excrete,
You gave your heart
For another's life to beat.

You offered your eyesight
So someone else could see,
And it is I who has your lungs
That now allow me to breathe.
Oh ! Great donor
Oh ! Secret donor
I know you now.
To you I take the deepest bow.

We will forever be in your debt
You are thoughtful and kind,
You will always be with us
In both body and mind.

You gave it all away
As a willing volunteer,
Now the gates have opened in heaven
For your spirit to appear.

Go ahead through the door
Let the Lord greet you with open arms,
May the angels sing thy praises
Of your compassion and all your charms.

Ciao Hasta la vista, Adios, Sayonara, Alvida,Good Bye !
Great and Secret donor, Life giver,
You will be remembered forever.

(हिंदी कविता का अंग्रेजी अनुवाद मनीष कांकाणी  द्वारा किया गया )

Saturday, October 19, 2013

मौज मनास्या खेता में (राजस्थानी कविता )


धौरा माथै बाँध झुंपड़ो
दौन्यु रैस्या खेता में
सीट्टा मौरस्या मौरण खास्यां
खुपरी खास्यां खेता मे
मौज मनास्यां खेता मे !

खेजड़ळी पर घाल हिंडोळो
हिंडो हिंडस्या सावण में
खाट्टा मिट्ठा खास्या बोरिया
कांकड़ वाला खेता में
मौज मनास्यां खेता मे !

लीलै धान की मीठी सौरभ
गमकै की जद खेता में
अलगोजा पर मूमळ गास्या
धौरां वाला खेता मे
मौज मनास्यां खेता मे !

हेत प्रीत रा कांकड़ डोरड़ा
आपा खोलस्या खेता में
हाथ पकड़ कर कनै बैठस्यां
बाता करस्यां खेता मे
मौज मनास्यां खेता मे !

साख सवाई अबके हुसी
घोटां पोटां बाजरियाँ
सिट्या तोड़स्या कड़ब काटस्या
खळो काढस्यां खेता में
मौज मनास्यां खेता मे !


Wednesday, October 9, 2013

पावन गंगा






स्वर्गलोक से भूलोक में चली आई गंगा।
कर निनाद पहाड़ो में बहती चली गंगा।।    

जाति-धर्म से बंधकर नहीं रही गंगा।
शीतल-निर्मल जल बहाती चली गंगा।।

ऋषियों की तपस्थली सदा बनी गंगा।
जन-जन के कष्ट हरे ममता मयी गंगा।

वसुंधरा को हरित बना बहती रही गंगा।
जंगल में मंगल करती बढती रही गंगा ।।

तीर्थ बने नगर सभी जहाँ से निकली गंगा।
जन शैलाब उमड़ पडा संगम बनी  गंगा।।

बहना ही जीवन जिसका रुकती नहीं गंगा।
कागद्विप में आकर सागर में मिलती गंगा।।

लेकिन अब अपनी पहचान खो रही है गंगा।
अमृत बदला जहर में अब सूख रही है गंगा।।

मत आहत करो प्रकृति कहती सबसे गंगा।
वरना एक दिन जलजला फिर लाएगी गंगा।।

Tuesday, October 8, 2013

शहीद की पीड़ा




मै इस देश की
सीमा पर तैनात एक 
अदना सा सिपाही हूँ

देश की
रक्षा करते हुए
आज शहीद हो गया हूँ 

मैंने अभी तक
जीवन के पुरे नहीं
किये हैं तीस बसंत 

पच्चीस बर्ष
की उम्र मे ही जीवन 
का हो गया अंत

मै जानता हूँ
मेरे  लिए कोई
शोक सभा नहीं होगी

कोई मौन
नहीं रखा जाएगा
कोई झंडा नहीं झुकेगा 

यहाँ तक कि
मेरे गाँव में मेरा कोई
स्मारक भी नहीं बनेगा

एक सिपाही की
मौत से किसी को क्या
फर्क पडेगा ?

हाँ ! फर्क पडेगा
मेरे बच्चो को जिनका
मै बाप था

मेरी पत्नी को
जिसका मै पति था 
मां को जिसका मै बेटा था

और .....कल के
अखबार के कोने मे 
एक छोटी सी खबर छपेगी

कश्मीर घाटी में
आतंकियों से मुकाबला करते
    तीन सिपाही शहीद। 




Monday, October 7, 2013

सुनहरे मोती

किसी की नजरो से गिरने में वक्त नहीं लगता,
मगर किसी के दिल में बस कर दिखाओ तो जाने। 

किसी से प्यार के वादे करने में वक्त नहीं लगता,
मगर वादा कर के उसे निभाओ तो जाने।  

अपने मतलब से तो सभी गले मिलते है,
मगर किसी को बिना स्वार्थ गले लगाओ तो जाने।  

सुख में तो सभी साथी साथ निभाते है,
मगर दुःख में साथ निभा कर दिखाओ तो जाने।  

हँसते बच्चे को तो सभी गोद उठाते है,
मगर किसी रोते हुए बच्चे को हँसाओ तो जाने। 

तुम हिन्दू-मुस्लमान कुछ भी बनो
मगर  पहले इन्शान बन कर दिखाओ तो जाने।  




Sunday, October 6, 2013

सबको अच्छा लगता चाँद



बच्चो का यह चन्दा मामा
नील  गगन से निचे आता
लोरी गाकर  उन्हें सुलाता
तारों के संग में आता चाँद
 सबको अच्छा लगता चाँद।

अमीर-गरीब का भेद नहीं
छुआ- छुत  की  बात नहीं
एकनजर और एकभाव से
सब के घर  में जाता चाँद
सबको अच्छा लगता चाँद।

रोज चांदनी के संग आता
अंधियारे में राह दिखाता
  लेकर बारात सितारों की  
   पूनम बनठन आता चाँद  
सबको अच्छा लगता चाँद।

ईद मनाओ या करवा चौथ
करे  चाँद  का  दर्शन लोग
गीता कुरान  का भेद नहीं
सब के मन को भाता चाँद
  सब को अच्छा लगता चाँद।

Wednesday, October 2, 2013

अनुभव के मोती

सुन तू ज्यादा कमती बोल,
वरना खोलेगा अपनी पोल। 

मन की बात को पहले तोल,
फिर उसको तु मुख से बोल। 

छल-कपट को मन से छोड़,
सबसे मीठी वाणी  बोल। 

दुनिया को क्यों देता दोष,
जो कहना है प्रभु से बोल। 

बिछुड़ गया वो फिर ना मिला, 
हम सब कहते  दुनिया गोल। 

बेकार के झंझट क्यों लेता मोल,
सब की हाँ में तू अपनी हाँ बोल। 

लोग प्रसंशा सुननी चाहते,
तू भी सबको वैसा तोल।  

दया-धर्म की गठरी खोल,
भोर भई अब आँखे खोल।






















Sunday, September 29, 2013

नीम का पेड़


नीम के पेड़ की
शीतल बयार
शुद्ध हवा।

पंछियों का बसेरा
गिलहरियों का फुदकना
चिड़ियों का चहचहाना।

लल्लन का पालना
छुटकी का झुला
कोयल का घोंसला।

सब देखते-देखते
अतित बन गया
पेड़ धराशाही हो गया।

कुल्हाड़ी के लगते ही 
पेड़ कांप उठा
पत्ती-पत्ती सिहर उठी।

आरे के चलते ही
दर्द का दरिया फुनगी से
जड़ो तक बह गया।

मेरे देखते-देखते एक
हरे-भरे पेड़ का
अंत हो गया।










Saturday, September 28, 2013

Special Tips for nose relief

Allergy Relief

If you have seasonal allergies,consider a lowcost nasal rinse. Mix 3 teaspoons of iodine - free salt with 1 teaspoon of baking soda. Add 1 teaspoon of  that to 8 ounces of lukewarm distilled or boiled water, then use a bulb syringe to irrigate your nostrils.

Thursday, September 5, 2013

बुढ़ापे में होता है


(१ )
चार-चार बेटो की
फरमाईस पूरी करने वाला बाप
बुढ़ापे में अपने बेटो से नहीं पूछता -
दवाईया नहीं लाने की वजह या
चश्मे की फ्रेम नहीं बनने का कारण।
वो अपने फट्टे हुए कमीज के
साथ-साथ मुंह पर भी पैबंद
लगा लेता है।

(२ )
बच्चे बुढ़े माँ-बाप को
बेसमझ समझते है और
अपने को अधिक समझदार,
इसलिए जब घर में उनके दोस्त
आते है तो उनको बोलने की
मनाही हो जाती है।

(३ )
बुढ़ापा एक कमरे में
सिमट कर रह जाता है
झड़ जाते है दिन और
बदल जाता है वक्त
अपने घर वालो के सामने ही
बौना हो जाता है बुढ़ापा। 

Monday, September 2, 2013

एक नन्ही परी


एक नन्ही  परी सी 
गुलाब की कलि सी
अपनी भाषा में कुछ बोलती 
हँसती मुस्कराती मधु घोलती।

एक नन्ही परी  सी
मिसरी की डली सी
लघु पांवों पर खडी होती
पकड़ खाट थोड़ी  चलती।

एक नन्ही परी सी
मन को लुभाती सी
दिन में किलकारियां भरती
गोदी में अठखेलियाँ करती। 
   
एक नहीं परी सी
हँसती सूरजमुखी सी
  अति कोमल नाजुक सी
  भोली-भाली  गुड़िया सी।

एक नन्ही परी सी
प्यारी छुई-मुई सी
बाहर जाने को खूब मचलती
 जाकर बाहर खुश  हो जाती। 

एक नन्ही परी सी
प्यारी राजदुलारी सी
दो अंगुलियाँ मुँह में लेती
कपड़ा लेकर उनको ढकती। 

एक नन्ही परी सी
दूजी नहीं आयशा सी।

(राजश्री-मनीष की बेटी आयशा और मेरी लाडली पोती "नागड़ी " जो नौ महीने की हो गयी है। टेंगो पर उसकी अठखेलियां देख कर कुछ लिखने का मन बना )  

Sunday, August 18, 2013

भलाई का काम


आओ बंधु !
घर से बाहर निकलो
कब तक कमरे में बैठे टी वी
देखते रहोगे ?

ईश्वर ने हमें
मानव तन दिया है
क्या इस से कोई भलाई का
काम नहीं करोगे ?

देखो कितना सुहाना मौसम है
ठंडी-ठंडी बयार चल रही है
आओ निकलो बाहर
आज कोई अच्छा काम कर आये

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाये
किसी भूखे को दो रोटी खिलाये
और नहीं तो किसी बीमार को
थोड़ी दवा ही पीला आये

देखो ! दुःखो का अंत तो
एक दिन सभी का होना है
हर अँधेरी रात के बाद
सूर्य निकलता है

हमें तो इश्वर ने एक मौका दिया है
क्यों नहीं हम उसका लाभ उठाये
हमें तो करना भी  उतना ही है
जितना सामर्थ्य से होता है

आओ निकालो बाहर
चलो मेरे साथ
करते है आज मिल कर
एक भलाई का काम।







Wednesday, August 14, 2013

गर्व है तुम्हारे ऊपर


हम सब को गर्व है
तुम्हारे ऊपर कि तुमने
इतनी हिम्मत दिखाई।

नहीं दिखा सकता
इतनी हिम्मत हर कोई
जीतनी तुमने दिखाई।

नर्सो की बात को
समझना और उनको
वापिस उत्तर देना तुम्हारे
लिए रोजमर्रे की बात थी।

नर्सो के साथ
उनके घर परिवार की
सुख -दुःख की बात करना
तुम्हारे लिए सहज बात थी।

नर्स से तुम रोज
उनके गीत सुनती
अपने गीत उन्हें सुनाती
अफ्रीकी नर्स से रोज डांस करवाती।

डाक्टर को
अपने बारे में बताती
उनसे सब कुछ पूछती
तुम निर्भय हो कर बात करती।

इतनी बड़ी अस्पताल
जिसमे हजारो कमरे और
पचासों लिफ्ट थी तुम अकेली
जांच करवाने जाती।

सच्ची -मुच्ची
हमें गर्व है तुम्हारे ऊपर
अनजाने देश में भी तुम
बेधड़क रहती।





















Wednesday, August 7, 2013

गर्मी को दिन (राजस्थानी कविता )

जेठ-असाढ़ के महीना में
घड़ी-दो घड़ी दिन कौनी चढ़ै
जताने तो तपबाने
लाग जावै सूरज।


दस बज्या ही घर सूं बारै
निकलबो होज्या मुसकिल
आभा सूं बरसाणे लाग ज्यावै
खीरा सूरज।


दोपारी मे चालै बळती डांफर
गली में बैठा कुता हुळक ज्यावै
अर सड़का पर पड्यो डामर
पिघल ज्यावै।

बलतो बायरो चैपै
ताता चींपिया डील माथै
गाभा करण लाग ज्यावै चप-चप
पसेवो बैवै जाण न्हार निकल्यो हुवै।


दिन आंथै  कौनी
बिउं पैली आ ज्यावै
बाळणजोगी आँधी अर
करद्ये टापरा को सत्यानाश।


रात बापड़ी ठंडी हुवै
जणा जार थोड़ी शांती मिलै
पण दिन उगता ही सूरज फैरू
तपबाने लागज्यावै लगाद्ये गळपांश।


Monday, August 5, 2013

चौपड़ (राजस्थानी कविता )

आ भायळा  चोपड़ खेला
धरम चबूतर चोपड़ खेला
                टाबर पण का खेल खेला
                 सगळा साथी सागै खेला।

पैळी जाजम ल्याय बिछावां
पछ चौपड़ ल्याय जमावां
               च्यार जणा नै भिड़ी बाँटा
               काली-पीळी गोट्या छांटा।

हरी हरावे, लाल जितावै
काली पीली पासो ल्यावै
                कोड्या फैंका पासो ल्यावा
                 दाँव-दाँव  पर होड़ लगावां।

मन चायो पासो  ल्यावां
पौ बारा पच्चीस लगावां
                   एक दूजा के ळारै भागा
                   पीछ पड़ कर गौटी मारा।

जमा गोटियाँ तोड़ करावां
काढ बावळी खेल बढावां
                 प्यारो खेल खेलता जावां
                 हार-जीत पर सौर मचावां।




Thursday, July 25, 2013

तुम्हे मुस्कराते देखा होगा।

तुम्हारा साथ है तभी तक यह जान है
तुम्हारे बिना मौसमे-बहार का भी क्या होगा

तुम्हारे जाने से लगा तनहा जीना आसन नहीं
तुम लौट कर आवोगी तभी मौसमे-बहार होगा

मेरे कानो के पास से जब भी गुजरती है हवाए
कहती है मत धबराओ तुम्हारा प्यार खरा होगा

तुम्हारे जाने से वीरान है ये आँखे
तुम लौट कर आओगी तभी मधुमास होगा

बीत गए कितने ही दिन तुमको गए हुए
उठती है एक हूक दिल में कुछ खलता होगा

मुझे पता है बादल भी यू ही नहीं बरसता
जरुर किसी की याद में आँसू बहा रहा होगा

महीनो बाद आज तुम लौट कर आयी हो
तुम्हे देख घर का कोना-कोना महका होगा

हँस पड़े बगिया के फुल जैसे ही तुम घर में आई
चराग भी खुद जल उठै, तुम्हे मुस्कराते देखा होगा।




Tuesday, July 16, 2013

गाँव रो पीपळ (राजस्थानी कविता )

गँवाई कुवै के
जिवणे पासै हो पीपंळ
अर पिपंल के पसवाड़े हो
सती दादी रो देवरो।


गौर-ईशर री जद सवारी
कूवै पर आंवती जणा गाँव री
छोरया-छापरया पींपळ रै हैठे
भैळी  हुय र गीत गांवती।


नुवों ब्याव हुयोड़ो जोड़ो
सती दादी रै गठजोड़े री
जात देवण आंवतो जणा
पीपळ री छियां आशीष देवंती।


बैसाख रे महीना में
भोरान-भोर गाँव री लुगायाँ
पीपळ सींचण ने आंवती
गट्ट पर बैठर कांण्या कैंवती
अर भजन गांवती।


टाबरिया रमता पीपळ की
छियाँ मांय दड़ी र गेडियो
अर लगाता लंम्बा-लंबा
दड़ी का टौरा जेठ-असाड
की गरमी रे मायं।


पीपऴ के निचे हुवंती
नारा-गाड्या री दौड़ अर
देखतो पुरो गाँव गौर के
मंगरीया मांय।

पण आज पिंपळ कौनी रियो
रेग्यो ळारे गट्टो,अर बीरी यादां
आसीस रे ओळावै पीपळ देग्यो
आपरी समूची उमर गाँव ने
छोड़ग्यो ळारै मीठी यादां।



Monday, July 15, 2013

आत्मसंतुष्टी

मैंने अपनी
पोती से पूछा
क्या कर रही हो ?

बस अभी-अभी
मैकडोनाल्ड से आई हूँ
पिछले सप्ताह मेरे जन्म दिन पर
कुछ फ्रेंड्स नहीं आ सके थे
उनको आज पार्टी दी थी।

अब क्या कर रही हो
मैंने फिर पूछा-
बस कुछ नहीं आज टी वी
मे एक नया सेरियल स्टार्ट
हुवा है मिस्टर पम्मी प्यारेलाल
उसी को देख रही थी।

तुम्हे राजस्थानी भाषा
पढ़ने का शौक है
इसलिए मैंने तुम्हारे लिए
पाँच-सात कविताये
राजस्थानी में लिखी है
तुम पढ़ना ---मैंने कहा।

दादाजी आपको तो पता है
इस साल बोर्ड एग्जाम है
कितनी मेहनत करनी पड़ रही है
एक मिनट का समय नहीं है।

मै सोचने लगा
क्या इसको कभी समय मिलेगा ?
क्या वो कभी पढ़ पायेगी
मेरी लिखी कविताऐ ?

अभी बोर्ड का एग्जाम है
फिर कॉलेज की पढ़ाई करनी है
आगे चल कर सर्विस करनी
नयी गृहस्थी को संभालना।

अपनी आत्मसंतुष्टी के लिए मै
एक गहरी सांस लेता हूँ -----
अनायास मुख से निकलता है ---
शायद कभी मेरी उम्र में।



























Friday, July 12, 2013

ओळाव (राजस्थानी कविता)

दुनिया की दादागिरी
को ठेको ले राख्यो है
अमेरीका।

शांती'र नाम दुनिया में
करे जुद्ध,लड़ाव देश के लोगा ने
एक दूजा स्यूं अमेरिका।

भेजे आपरी फौजा
देव नुवां-नुवां हथियार
शुरू करे अंतहीन जुद्ध अमेरिका।

आभै में कांवळा दाईं
उडावै हवाई जहाज
ठोड-ठोड फैंक ब़म अमेरिका।

बिना मिनखा
चाळबाळा हवाई जहाज
डरोण बरपाव कहर।

आग की च्यांरा कानी उठे
लपटा, धुंवारा उठै गुब्बार
मिटज्याय गांव र शहर।

चिखा अर चितकारा सुणीजे चौफेर
दिखै छत-बिछत हुयोड़ी ळाशा
दिन रात हुवै धमाका।

चिरळी मारै घरां में
सुत्योड़ा टाबरिया
सुण र बामा रा धमाका।

बरसा न बरस चाळै
शांतीर नावं पर
अशांती रो जुद्ध।

मन में बैठ्या दरिंदै ने तो
कोई न कोई ओळाव चाईजै
करनै दुनिया में जुद्ध।










Wednesday, July 10, 2013

दादी रो टुंणो (राजस्थानी कविता)

दादी जाणती
टुंणो  करणो
गांव में आँधी आंवती
जणा रोक देवंती आंधी ने
कर देती टुंणो।

टाबरिया धूळरा बतूळा
देखता र भाजता
दादी कनै अर केंवता
दादी आँधी आवै है
बेगो करो टुंणो।

दादी ल्याती बुवारी
अर ऊपर मैळती भाटो
राळती बाजरी का आखा
सींच देती कलस्य स्यूं पाणी
कर देती टुंणो।

टाबरियां रो
बिसवास हो दादी
अर दादी रो बीसवास हो
आपको  टुंणो।

जे कदास 
आँधी आ ज्याती तो
दादी केती बाळणजोगी पेळी
बड़गी कांकड़ में,नहीं जणा तो
कर देतो जापतो म्हारो टुंणो।

Sunday, July 7, 2013

बळजी (राजस्थानी कविता)


               (१)

बळजी
साँचो माणस हो।

माँ दिशावर गयी जणा
बळजी ने संभाळाय'र गयी
आपको सगळो गैणो-गाँठो,
बळजी नींग रखिज्ये।

बळजी गैण की पोटळी तो
पकड़ली पण रातां की
नींद उड़गी।

माँ पाछी आई
जणा पोटळी पकड़ाय'र
बळजी बोल्यो "सेठाणी जी
आज सुख की नींद सोंवुला"।


                 (२)

बळजी
भळो माणस हो।

गाँव में सगळा के
सुख-दुःख में आडो आंवतो
आधी रात ने कोई आ ज्यातो
बळजी पग जुती कोनी घालतो।

आराम-बीमार पड्या
बळजी घरा जायै झाड़ो देंतो,
गाँव का लोग कैवता बळजी को
झाड़ो पळै है।

                 (३)
बळजी
स्याणो माणस हो।

ब्याव-सावा में
ओसर-मोसर में गाँव में
मिठाई बळजी ही बणातो।

पण मजाळ की
कदैई बळजी कोई स्यूं
पांच रिपिया भी मांग्या हुवै।

कोई दे दिया
तो बळजी राजी अर कोई
नहीं दिया तो बळजी राजी।

बळजी मीनख हो
मीनख कांई जबर
मीनख हो।




Friday, July 5, 2013

खेत के गेळै मे (राजस्थानी कविता)

म्हने याद है
खेत के गेळै मे 
तू चाळै ही आगे-आगे
मै चाळो हो थारै गैळ -गैळ

रास्ते में
थारो ओढणो झाड़का के
काँटा में उलझग्यो

तू देख्यो कि
मै थारो पल्लो पकड्यो है
तू झट बोल पड़ी---

हे रामजी!
थे तो रस्ते में ही---
अबार माथो उघड़ ज्यावंतो

मै उछलग्यो
अर देखबा लागग्यो
थारो मुंडो

ईतना में तू
बोल पड़ी ---

मरज्याणा
बाळणजोगा
ऐ झाड़का ही
थारै दांई हुग्या।

Thursday, July 4, 2013

चौमासो (राजस्थानी कविता)

जका चल्या गया छोड़ र गाँव
बसग्या टाबरा ने ळैर परदेश
                        बानै कांई लेणो है बिरखा स्यूं
                       अर कांई लेणो है चौमासा स्यूं।


दीसावरा में चाळै चौखा धंधा
एयरकण्डीशन में बैठ्या करे मौज
                      देश में बिरखा बरसे जे नहीं बरसे
                               बांको मन तो कदै नी तरसे।


बाजार में मिल ज्यावै सगळी सरा
काकड़ी,मतीरा,काचरा र फल्या
                         चोखा-चोखा छांट-छांट ले आवै
                     जणा बानै क्यू चौमासो याद आवै।


फरक पड़े है गाँव में रेव जका कै
नहीं बरस्या काळ पड़तो ही दिखै 
                   पड्या काळ मुंडै पर फेफी आज्यावै
                      डांगर-ढोर भूखा मरता मर ज्यावै।


ना होली दियाळी लापसी बणै
ना टाबरियां ने सीटा पौली मिलै
                      घरा में रोट्या का फोड़ा पड़ ज्यावै
                      बाबो बिना दुवाई के ही मर ज्यावै।








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Friday, June 28, 2013

बचपन में शादी

मै ऑफिस से आया ही था
कि चुपके से आकर
किसी ने मेरी दोनों आँखे
अपनी नरम हथेलियों से
बंद करदी।

और फिर मुझसे पूछा
बताइये मै कौन हूँ ?
मैने अपने हाथो से
उन कोमल हाथो का
स्पर्श किया और कहा-पुजा
ऊँ हूँ -उत्तर आया
मैंने कहा राधिका
वो भी नहीं -
और मेरी आँखे खोल
सामने आकर बोला-
मै गौरव हूँ।

मै मुस्करा उठा
उसने मुझे एक एलबम
दिखाते हुए पूछा-
दादा जी यह आपका फोटो है ना
मैंने कहा हाँ
आप कितने हैण्डसम लग रहे है
और दादीजी भी कितनी क्यूट लग रही है।

(राजस्थान के गाँवों  में पहले बहुत छोटी उम्र में शादियां कर दिया करते थे. मेरी शादी के समय उम्र मात्र  सतरह साल की थी और सुशीला की साढ़े बारह साल की। )










Wednesday, June 26, 2013

बूढ़ापो (राजस्थानी)


म्हारी पींडियां में
चमके बीजळियां
पांसळियां मेळे
चबका

बूकियां में चाले
बाईंटां
डील की चटके 
सगळी हाडक्या

सगळै सरीर में
 चालै सिरणा 
सांसा चाळै
धोंकणी ज्यूं

अंख्यारी सगळी
चली गई जौत
कान हुग्या सफा 
साव बेरा

सळा भरगी
डीळरी चामड़ी
माथै रा केस
हुग्या धोळा  

बुढापो लागे
 जाणै कोई खुरदरा
कागज़ माथै घसीटती
कलम चालै

अब औ गुमान
करणो बिरथा के
 म्हारी जड़ा जमीन
  में उंडी लागै।

































प्रकृति का ताण्डव




केदारनाथ मंदिर
उतराखण्ड का प्राचीन धाम
करोड़ो हिन्दुओ की श्रद्धा का केंद्र
जहाँ सुनाई दे रही है
सदियों से आस्था की गूंज।


वही मंदिर आज 
खण्डहर बना खडा है
न पुजा,न पाठ न आरती, न भोग
भांय भांय करता 
सिर्फ और सिर्फ सन्नाटा।


शिव मूक है
गंगा कर रही है तांडव 
इंद्र देवता का रौद्र रूप देख
मन्दाकिनी ने भी 
धारण कर लिया है विकराल रूप।


चारो तरफ 

बिखरी पड़ी है लाशें 
कहीं पत्थरों में दबी हुयी है 
तो कहीं मलबे में फंसी हुयी 
अकाश में मंडरा रहे है सैंकड़ो गिद्ध।


पहाड़ो से

ऐसा जलजला आया 
तबाही का मंजर पसर गया 
प्रकृति के इस भयावह 
तांडव को लोग वर्षो याद रखेंगे। 

मिट्टी के सैलाब में
हजारों अपने बाह गए 
बेटे को बाप ढूँढता रह गया
पत्थरा गयी आँखे 
पलको जीवन बिखर गया। 










Saturday, June 22, 2013

अनकहा दर्द


प्यार के लिए सात समुद्र पार
कभी कभी महँगा पड़ जाता है।
                   एक का सानिध्य पाने के लिए
                   देश-परिवार सभी छूट जाता है।

जवानी तो जोश में बीत जाती है
लेकिन बुढ़ापा भारी पड़ जाता है।
                   अपनो की यादे सताने लगती है
                   एकाकीपन भारी लगने लगता

घुट कर उमर बीत जाती है
एक जीवन अपनो के बिना।
                    छोटी आकांक्षायें भी रह जाती है
                    मन में किसी के साथ बाँटे बिना।

उम्र भर तड़पते ही रह जाते है
पाने के लिए अपनो का प्यार।
                         विदेशी धरती पर नहीं मिलता
                          अपनी धरती का सच्चा प्यार।

जब यादों की गांठे खुलती है
गली दोस्तो की यादे आती है।
                      दिल में सिर्फ यादे ही बची रहती है
                      जिन्दगी घिसे सिक्के सी लगती है।

(पिट्टसबर्ग,अमेरिका में एक वृद्ध दम्पती से मिल कर, मुझे जो कुछ अनुभव हुवा,उसी को मैंने शब्द दिए हैं )

Wednesday, June 19, 2013

बादल फट पड़े



१७ जून को देवभूमि में तांडव मचा
बादल क्या फटे मौत कहर ढा गयी।
                            कच्चे मकानों की क्या बात करे
                          चार चार मंजिले इमारते बह गयी।

अलकनंदा-मंदाकिनी  है पुरे उफान पर
कोई थमने का कही नाम नहीं ले रही है।
                   पुरे गाँव और शहर पानी में बह गए है
                   आसमानी कहर को धरती झेल रही है।

उतराखण्ड में ऐसा तांडव कभी नहीं हुवा
जल कुलांचे भर रहा था हिरण की तरह ।
                  क़यामत का मंजर और तमतमाई लहर
                  मकान गिर रहे थे तास के पत्तो की तरह।

अभावग्रस्त पार्वत्य समाज बेहाल हो गया
नदी किनारे बसा जीवन बरबाद हो गया ।
                   दिल दहलाने वाला बना तबाही का मंजर
                    होटले, मकान,दुकान, सब कुछ बह गया।

मुक्ति के प्रतिक तीर्थो में  भ्रमण करते
लाखो तीर्थयात्री जगह -जगह फसं गए।
                     हजारो की संख्या में मरे,हजारो घायल हुए
                      गाडिया,बसे और बुलडोज़र सभी बह गए।

चारो और सुनाई दे रही थी खौपनाक चीखे
दिख रहा था मलबे में दबी लाशो का मंजर।
                      देव भूमि में ऐसा विनाशकारी बरपा कहर
                      लील गयी सब कुछ रस्ते में उफनती लहर।

हमें इस चेतावनी को समझना होगा
ग्लोबल वार्मिंग को कम करना होगा।
                      परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना होगा
                          नहीं तो फिर इसी तरह से मरना होगा।



Tuesday, June 11, 2013

गंगा घाट पर

गंगा घाट पर
शाम के समय बैठ जाते हम
किनारे खड़ी नौका में।

लहरों के थपेड़ो से
डोलती रहती नौका और हम
झुलते रहते नौका में।

याद है मुझे आज भी
वो पुरे चाँद की रात जब
हम दोनों बैठे हुए थे नौका में।

चाँद का प्रतिबिम्ब
इठला रहा था नदी में और लहरे
किनारे को छु लौट रही थी जल में।

तुम जल तरंग सी
स्वर लहरी में भजन गा रही थी
बैठी हुयी नौका में।

तुम्हारा भजन मुझे
कभी प्रवचन तो कभी पावन श्रुति
सा लग रहा था बहते जल में।

चाँद भी साथ-साथ हँस रहा था
चांदनी भी खिलखिला रही थी।
गंगा के बहते जल में।

तुम्हारी साँसों से कस्तुरी और
रोम-रोम से चन्दन की सुगंध
महक रही थी नौका में।

तुम्हारी सुवास आभास करा रही
असंख्य स्वर्गिक अनुभूतियों का
गंगा घाट पर नौका में।



















Sunday, June 9, 2013

सम्बन्ध विच्छेद

आज हमारे सम्बन्ध विच्छेद के
दस्तावेज पर न्यायाधीश ने
हस्ताक्षर कर दिया।

कर्मकांडी वकीलों ने भी
हमारे रिश्ते की मृत्यु पर गरुड़
पुराण का पाठ पढ़ दिया।

मैंने भी तुम्हारे प्यार का
सारा कूड़ा कचरा दिल से खुरच
कर बाहर फैंक दिया।

और सुनो ! रिश्ते की कब्र पर
कफ़न गिरा एक दुखद अतित
का अन्त भी कर दिया।

तुम्हारे जितने भी पत्र और तस्वीरे थी
उनको भी आज गंगा मे बहा कर
तर्पण कर दिया।

लगे हाथ गंगा किनारे तुम्हारी यादो
और अहसासों का पिंडदान
भी कर दिया।

दफ़न कर दिया जिन्दगी
का हर वह लहमा जो तुम्हारे
साथ बिताया।

एक लम्बे समय बाद
दिल ने आज राहत ओ सूकून
भरा दिन बिताया।



Friday, May 31, 2013

विरासत



क्या हमने कभी
सोचा है कि है कि हम
किधर जा रहे है?

एक पेड़ लगाने की
नहीं सोचते और जंगलो
को काटते जा रहे है।

वायु मंडल में बारूद
और जहरीली गैसे छोड़ कर
वायु को प्रदुसित कर रहे है।

नदियों में गंदा पानी
और फक्ट्रियों के केमिकल
बहा कर नदियों को गंदा कर रहे है।

वाहनों के आत्मघाती
धुंए से ओजोन की परत में
छेद करते जा रहे है।

समुद्रो में उठता जलजला
दरकते पहाड़ और जमीन हमें
चेतावनी दे रहे है।

बादलो का फटना
ग्लोबल वार्मिंग,भूकम्प हमें 
सावधान कर रहे है।

फिर क्यों नहीं हम
अपनी प्यारी धरती को बचाने
की सोच रहे है।

क्या हम आने वाली
पीढ़ी को यही सब विरासत में
देने जा रहे है?






















Monday, May 27, 2013

कटेली चम्पा



कोलकता के
विक्टोरिया मेमोरियल
का हरा भरा मैदान।

सुबह का समय
साइड वाक पर घुमते
लोगो का हुजूम।

कटेली चम्पा के
फूलो से वातावरण का
महकना।

फूलो का अपना
अस्तित्व कायम रखने की
  हर संभव कोशिश करना।

तभी क्रूर हाथो का
बढना पेड़ की तरफ और
 तोड़ लेना फूल को।

दो-चार हाथों मे से 
 निकलना फुल का और
नोच डालना पंखुड़ियों को।

कर डालना उसकी
गंध और कोमलता को
तहस-नहस।

इन्सान की हवस से
फुल के अस्तित्व का
चिर-हरण।

कटेली चम्पा के 
अन्तर से दुखोच्छवास
का छुटना। 

फूल जो पेड़ का सौंदर्य है, उसकी सोभा है, लेकिन विक्टोरीया में घूमते लोग कटेली चम्पा के पेड़ पर लगे फूल को ढूँढ कर तोड़ लेते है। थोड़ी देर फूल दो चार हाथो में घूमता है और फिर नोच कर डाल  दिया जाता है, पांच मिनट में फूल का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। 
















Sunday, May 26, 2013

सबकी दुलारी





आयशा
तुम छः महीने की हो गयी
  तुम अब बैठना सीख गयी।

परिचित को देख मुस्कराना
अपरिचित को देख कर रोना
 अब तुम समझने भी लग गयी
 आयशा तुम बैठना सीख गयी।
हाथ के अँगूठे को चुसने लगी
पाँव केअँगूठे को भी लेने लगी
हटाने  पर मचलने लग गयी
 अब तुम बातूनी भी  हो गयी।

अब तुम घुटनों के बल चलोगी
हर चीज को उठा मुंह में डालोगी
मम्मी जब कान पकड़ कर डाटेंगी
दादीजी प्यार सेगोदी में उठा लेगी।

घिरे-धीरे तुम थड़ी करने लगोगी
कुर्सी को पकड़ खड़ी होने लगोगी
आँगन में पायलियाँ खनक उठेगी  
जब तुम पहला कदम रखोगी ।

तुम्हारा ठुमक-ठुमक कर चलना
तुम्हारा तोतली बोली में बोलना
हम  सब के  मन  को  भायेगा 
हमारा भी बचपन लौट आयेगा।













Friday, May 24, 2013

प्रभु अगर ऐसा हो जाता



प्रभु अगर ऐसा  हो जाता
मै  छोटा पक्षी बन जाता
आसमान में ऊँचे उड़ कर
कलाबाजियां मै भी खाता।


पेड़ो पर मीठे फल खाता
झरनों का मै पानी पीता
स्कूल से हो जाती छुट्टी
होमवर्क नहीं करना पड़ता।


खेतो-खलिहानों में जाता 
नदी-नालो के ऊपर उड़ता
उड़ कर देश-प्रदेश देखता
नानी के घर भी उड़ जाता।


उड़ने पर कोई रोक न होती
आसमान मेरा घर होता
जब तक मर्जी उड़ता रहता
शाम ढले घर पर आ जाता।


मीठी वाणी बोल बोल कर
सबके मन को मै मोह लेता
बच्चो को मै दोस्त बना कर
सब को मीठे फल खिलाता।
















Saturday, May 18, 2013

राबड़ी (राजस्थानी)

ऊँखळ के सागे
मूँसळ भी पड्यो है
दूबक्येड़ो एक कुणा में।

कुण पूछ है अब
सगली बित्ये ज़माना
की बाता रेगी।

एक जमाने नाजुक कलायाँ
ऊँख़ळ में कूटती
बाजरों।

चुड्याँ की खणखणाट
सुणीजती गौर ओ
गुवाड़ी ताई।

रंधतो खदबध खीचड़ो
र बणती छाछ की
राबड़ी।

खार खीचड़ो र
टाबरिया कूदता
घोड़े मान।

खार राबड़ी र
बाबो सोंवतो
खूंटी टाँण।

राबड़ी की थाली
बाबो धोर पिंवतो
जणा केवतों।

सबड़क सुवाद लागे
मीठी लागे
राबडी।

उंणा खुणा सौ भरय़ा
स्याबाश म्हारी
राबड़ी।















Tuesday, May 14, 2013

मंत्री जी की दिक्षा


 
परम्परानुसार नया मंत्री शपथ
ग्रहण के बाद प्रधान मंत्री जी* से
आशीर्वाद लेने आता है।

प्रधान मंत्री जी उसे अर्थशास्त्र
का ज्ञान देते हुए जीवन में
अर्थ का महत्त्व बताते है।

कुर्सी आज तुम्हारे साथ है
कल नहीं भी रहे लेकिन अर्थ
जीवन में हर पल साथ देता है।

इसलिए कुर्सी रहते हुये
अर्थ का आदर करना सीखो
मौका बार-बार नहीं मिलता है।

मत्री अपने कार्यकाल में प्रधान
मंत्री जी की सलाह को तहे दिल
से पालन करता है।

कम से कम समय में
बड़े से बड़े घोटालो को अंजाम
देता हैऔर अर्थ की वेवस्था करता है।

एक-एक घोटाला अरबो में करता है
आठ-दस पीढ़ी तक का इंतजाम
एक बार में कर लेता है।

विपक्ष और न्यायालय के दबाव में
मंत्री को हटा कर नए मंत्री को
शपथ दिलाइ जाती है।

परम्परानुसार नया मंत्री शपथ ---------

*हमारे प्रधान मंत्रीजी एक अच्छे अर्थशास्त्री है ,यह कविता व्यगं मे लिखी गयी है।













Wednesday, May 8, 2013

पचास वर्षो का सफ़र



मेरी चाहत थी
इसी जीवन में
सब कुछ पाने की।

नहीं चाहत थी
अगले जन्म में
फिर कुछ पाने की।

तुम मुझे मिली
मानो गुलशन में
बहार आई।

मेरी राहों के कांटे
पलकों से उठाये
तुमने।

मुझे अम्बर तक
उठने का अहसास
दिया तुमनें ।

अपनी हँसी संग
मुझे मुस्कराहट
दी तुमने।

जीवन के पचास
बसंत साथ बिताये
तुमने।

चंद शब्दो में कहूँ
जीवन में सब कुछ
दिया तुमने।























Tuesday, April 30, 2013

अंग दान करे

जब कोई वस्तु हमारे काम की
नहीं रहती तब भी उसकी
उपयोगिता रहती है।

भले ही वो हमारे काम की
नहीं रहे, किन्तु किसी दुसरे
के तो काम आ ही सकती है।

शरीर जो आज हमारा है
कल हमें छोड़ कर जाना होगा
पता नहीं कब साँझ ढल जाये ।

फिर क्यो नहीं ऐसा करे कि जो 
हमारे काम का नहीं है वो किसी
दुसरे के काम आ जाये।

हम अपनी आँखे दे कर
किसी के जीवन में रोशनी की
किरण ला सकते है।

हम अपना ह्रदय देकर
किसी की धड्कनो को ज़िंदा
रख सकते है।

हम अपने फेफड़े दे कर
किसी की साँसों को जीवित
रख सकते है।

हम अपने गुर्दे दे कर
किसी के जीवन को बचा
सकते है।

शरीर के अंगो का दान कर
कई लोगो को नया जीवन
दिया जा सकता है।

तो फिर क्यों नहीं
इस शुभ कार्य की शुरुआत
हम आज ही करे।

मृत शरीर का दान कर
अनेको की जिंदगी फिर से
रोशन करे।

No one should assume

they are too old or unhealthy
to donate organs.
Even those people who know
they are dying may qualify,
as successful transplants
have been performed from
all sorts of donors.
The heart, kidneys, lungs,
pancreas and liver might be
debilitated by treatment or disease,
but eye, bone and skin tissue
may all be suitable for grafting
and transplantation.














Monday, April 29, 2013

पिट्सबर्ग तुम याद आवोगे

मुझे  पिट्टस बर्ग  अच्छा लगा 
गिरते बर्फ के फोहों के बीच भी
मुझे सुखद आभास होने लगा।
पश्चिम की संस्कृति को देखने 
समझने का अवसर जो मिला
कुछ अच्छा तो कुछ बुरा लगा। 

अच्छा लगा रास्ते चलते सभी का
मुस्करा कर हाय कहना और सभी को
थैंक्स बोलकर आभार प्रकट करना।

सड़क पर पैदल चलते यात्रियों को 
गाडी रोक कर रास्ता पार कराना 
बूढ़े और अपाहिजों को जगह देना। 


अच्छा लगा साईड वाक पर दौड़ना
जिम में जा कर ब्यायाम करना
स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना।

मेहनत और सच्चाई से सुखपूर्वक
आनंदमय जीवन यापन करना 
यथासंभव दूसरों की सहायता करना।

लेकिन कुछ बुरा भी लगा 
तुलना कर देखा तो मेरा देश
एक पायदान ऊपर  लगा। 


लेकिन कुछ भी हो पिट्स बर्ग
मेरी यादो में हमेशा बसा रहेगा
 मुझे बराबर याद आता रहेगा। 

Tuesday, April 23, 2013

तब जाकर नेता बने




जो  कानून से नहीं डरे
बड़े से बड़े घोटाले करे
भ्रस्टाचार में नाम करे
चोरी स्मगलिंग सब करे। 
                         जब कोई ऐसे काम करे
                             तब जाकर नेता बने

जातिवाद का शंख बजाये
क्षैत्रवाद का भूत जगाये
सम्प्रदायों को भड़काये
दंगा और फसाद कराये। 
                          ऐसे जब कोई काम करे
                              तब जाकर नेता बने।

सरकारी धन का गबन करे
रिश्वत खाये  बेईमानी करे
जेल में जाकर अनशन करे
बाहर निकल भाषण करे
                            जब कोई ऐसे काम करे
                                तब जाकर नेता बने

श्रमिको के संगठन बनाये
कारखानों को बंद कराये  
रेले  रोके बसे जलाए 
तोड़-फोड़ और आग लगाए
                              जब कोई ऐसे काम करे
                                  तब जाकर नेता बने

जनता  में  दशहत फैलाए
चुनावों में फर्जी वोट डलाए
असली वोटर जब भी आए
उन्हें मार कर  दूर भगाए
                              जब कोई ऐसे काम करे
                                   तब जाकर नेता बने


अपने बेटो को दबंग बनाए
भाषण देना उन्हें सिखाए
नेतागिरी के गुण समझाए
लीडर बन कर भीड़ जुटाए
                               जब कोई ऐसे काम करे
                                    तब जाकर नेता बने।























Sunday, April 21, 2013

देखो बसंत आया रे


  
गमकती बयार चली 
        नव प्रसून फुले रे 
            केशरिया वस्त्र पहन
                 फोरसिंथिया लहराया रे
                          देखो बसंत आया रे।

हिम के दिन बीत चले
       सूरज बाहर निकला रे 
              रंग-बिरंगे रंगों में फिर 
                    ट्यूलिप मुस्कराया रे
                           देखो बसंत आया रे।

खिल उठी कलि-कलि
        महक उठा चमन रे 
              रंग-बिरंगे फूलो की
                     खुशबु पवन चुराए रे
                             देखो बसंत आया रे।

फूलो पर तितली मंडराये 
          पक्षी गीत  सुनाये रे 
                 पेड़ो के संग मस्ती में
                         हवा बजाये तबला रे
                                देखो बसंत आया रे।
  
गदराई हर डाल-डाल
        नेक्ट्रीन भी दमका रे 
                चैरी ट्री ने ओढ़े सुमन 
                      फूटा रंगों का झरना रे 
                               देखो बसंत आया रे।






पिट्सबर् (अमेरिका) में बसंत का नजारा देख कर तन-मन झूम उठा। १० दिन पहले यहाँ बर्फ गिर रही थी। तापमान माइनस तीन डिग्री पर था और आज चारो तरफ फूल खिल रहे है। घरो के सामने लोन में हरी घास की चुनर बिछ गयी  है। साइड वाक् फूलो से ढक गए है। चैरी,फोरसिथिया,ट्यूलिप,पीच ट्री, पियर ट्री, नेक्ट्रीन, ऐप्रिकोट, मैग्नोलिया के पेड़ फूलो से लद गए है। पत्तियों रहित टहनियाँ गुलाबी,सफ़ेद,नारंगी, लाल,बेंगनी नीले फूलो से ढक गयी है। लगता है प्रकृति खुद उत्सव मनाने लगी हो।

पक्षियों की मधुर आवाजे पेड़ो पर गूँजने लगी है।मेगनोलिया के गहरे लाल रंग के फुलो के परिधान में धरती नववधु सी लग रही है। सफ़ेद फूलो वाले ऐपरीकोट ट्री ऐसे लगते है जैसे सफ़ेद रेशमी पताकाऐं फहरा रही है। साइड वाक पर झाड़ियों की कतारों में फोरसिंथिया के पीले फूल खिले हुए है। घरो के सामने रंग-बिरंगे टूलिप फूलो का सोन्दर्य तो देखते ही बनता है। फूलो की खुशबु अपनी सौरभ से वायु को सुवासित कर रही है।लगता है जैसे पिट्सबर्ग  में नंदन कानन उतर आया है।



Thursday, April 11, 2013

एक नजर






प्रकृती ने लुटाया
अपनी
भव्यता का खजाना
देखिये एक नजर।

आकाश के कैनवास
पर उभरते
नये-नये रंग 
उठाइये एक नजर।

समुद्र के गर्भ में
छिपा पड़ा अद्धभुत
जलचर संसार 
झाँकिये एक नजर।

पक्षियों की बोलियाँ 
झरनो का संगीत 
गुनगुनाते भंवरे
डालिए एक नजर।

फूलो की खुशबू से
सुरभित बयार
झूमते पेड़-पौधे
देखिये एक नजर।

आकाश को चुमते   
विशाल पर्वत
चमकती हिमराशि
दौड़ाइये एक नजर।