Sunday, July 7, 2013

बळजी (राजस्थानी कविता)


               (१)

बळजी
साँचो माणस हो।

माँ दिशावर गयी जणा
बळजी ने संभाळाय'र गयी
आपको सगळो गैणो-गाँठो,
बळजी नींग रखिज्ये।

बळजी गैण की पोटळी तो
पकड़ली पण रातां की
नींद उड़गी।

माँ पाछी आई
जणा पोटळी पकड़ाय'र
बळजी बोल्यो "सेठाणी जी
आज सुख की नींद सोंवुला"।


                 (२)

बळजी
भळो माणस हो।

गाँव में सगळा के
सुख-दुःख में आडो आंवतो
आधी रात ने कोई आ ज्यातो
बळजी पग जुती कोनी घालतो।

आराम-बीमार पड्या
बळजी घरा जायै झाड़ो देंतो,
गाँव का लोग कैवता बळजी को
झाड़ो पळै है।

                 (३)
बळजी
स्याणो माणस हो।

ब्याव-सावा में
ओसर-मोसर में गाँव में
मिठाई बळजी ही बणातो।

पण मजाळ की
कदैई बळजी कोई स्यूं
पांच रिपिया भी मांग्या हुवै।

कोई दे दिया
तो बळजी राजी अर कोई
नहीं दिया तो बळजी राजी।

बळजी मीनख हो
मीनख कांई जबर
मीनख हो।




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