Wednesday, July 10, 2013

दादी रो टुंणो (राजस्थानी कविता)

दादी जाणती
टुंणो  करणो
गांव में आँधी आंवती
जणा रोक देवंती आंधी ने
कर देती टुंणो।

टाबरिया धूळरा बतूळा
देखता र भाजता
दादी कनै अर केंवता
दादी आँधी आवै है
बेगो करो टुंणो।

दादी ल्याती बुवारी
अर ऊपर मैळती भाटो
राळती बाजरी का आखा
सींच देती कलस्य स्यूं पाणी
कर देती टुंणो।

टाबरियां रो
बिसवास हो दादी
अर दादी रो बीसवास हो
आपको  टुंणो।

जे कदास 
आँधी आ ज्याती तो
दादी केती बाळणजोगी पेळी
बड़गी कांकड़ में,नहीं जणा तो
कर देतो जापतो म्हारो टुंणो।

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