Tuesday, August 24, 2010

जुदाई




दूर तक साथ चलना था
राहे - सफ़र में हमें,
पल भर भी दूर रहना 
गँवारा नहीं था हमें। 

लगता था एक- दूजे के लिए
ही बने थे हम,
आज वो सारे कसमें -वादे
भूल गये हम।

सौ जन्मों तक साथ निभाने
का वादा किया था हमने,
अपने घर को स्वर्ग बनाने का
 सोचा था हमने।

कल्पना के गुलसन में अनेक
फूल  खिलाये थे हमने,
आज मधुमास को पतझड़ में
बदल लिया हमने। 

 अपनी ही बातो पर
रोज अड़ते रहे हम,
एक दूसरे की बातो  को
रोज काटते रहे हम।

 अपने-अपने स्वाभिमान
को रोज टकराते रहे हम,
एक दूसरे के दिल में
नहीं रह सके हम। 

छोटी - छोटी  बातो  ने
जुदा कर दिया हमको,
मन इतने बदल जायेंगे
मालूम नहीं था हमको।

कभी अपने ही रास्ते पर
फूल बिछाये थे हमने,
आज उसी चमन में
काँटे बिछा लिए हमने।

  खंजर से नहीं बातो से ही  
दिल  टूटे गए  थे  हमारे,
जीवन   के  सारे ख्वाब
चकनाचूर हो गये थे हमारे।

 नहीं संभव अब हम  फिर
इस जीवन में साथ रहेंगे,
एक आसमा के नीचे रह कर 
भी हम अंजान  बन रहेंगे।

कोलकाता
२४  अगस्त, २०१०
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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