Tuesday, July 19, 2016

याद तुम्हारी गीत बन गई

फ्रेम में जड़ी तुम्हारी
तस्वीर देख कर सोचता हूँ
आज भी दमक रही होगी 
तुम्हारे भाल पर लाल बिंदिया

कन्धों पर लहरा रहे होंगे 
सुनहरे रेशमी बाल 
चहरे पर फूट रहा होगा 
हँसी का झरना

चमक रही होगी मद भरी आँखें
झेंप रही होगी थोड़ी सी पलकें
देह से फुट रही होगी 
संदली सौरभ 

बह रही होगी मन में  
मिलन की उमंगे 
बौरा रही होगी प्रीत चितवन 
गूंज रहा होगा रोम-रोम में
प्यार का अनहद नाद

मेरे मन में आज भी थिरकती है
आषाढ की बारिश में उपजे
तालछापर के मोथियों की
जड़ों सी मीठी तुम्हारी यादें।


                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




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