Wednesday, January 13, 2016

मेरा स्वाभिमान

सर्द अँधेरी रात
बर्फीली हवाओं के झोंके
कम्पा देने वाली
ठिठुरी हड्डी सी रात

दिन भर गलियों में
भीख माँगने के उपरान्त
अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ
सड़क किनारे पड़े गट्टर में
ऊंघती औरत

भूख और गरीबी से झुंझते
ठण्ड से ठिठुरते
पुल के निचे सहमे सिमटे
लावारिस बच्चे

टूटे टीन के शेड और
पॉलिथीन के टुकड़ों से बनी
झोंपड़ियों में दुबके
भिखारियों के परिवार

इन्हें देख झकझोरता
स्वाभिमान मुझे
कैसा है यह महानगर
धनी-निर्धन की बदकिस्मत
दीवारों से बंटा हुआ

क्या जागेगा
मानव ह्रदय कभी
उड़ेलेगा सूर्य की तरह प्रकाश
सम्पूर्ण मानव जाति पर
एक सामान

और बनेगा सुन्दर
सद्भावना पूर्ण संसार
एक दिब्य संसार।




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