Monday, January 19, 2009

वतन

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आभारी हूँ मैं तुम सबका, जो इतना प्यार दिया,
अपना समझ कर हमें,जो इतना सम्मान दिया |
                हम तुम्हारे इस प्यार को साथ लिए जा रहे हैं,
                आज हम वापस अपने  वतन को जा रहे हैं |

ये खुशियाँ जो तुम लोगो ने दी, बहुत याद आयेंगी,
ये क्षण जो  सब के साथ बिताए, हर पल याद  आयेंगे |
                हम इन सुखद स्मृतियों को साथ लिए जा रहे हैं,
                आज हम वापस  अपने   वतन को जा रहे हैं।

परिवार से दूर रह कर भी, परिवार की तरह रहना,
एक दूसरे  के सुख-दुःख में सदा साथ- साथ  रहना  |
               ऐसे परिवार की  मधुर यादें साथ लिए जा रहे हैं,
               आज हम वापस  अपने  वतन को जा रहे हैं।

जिन्दगी के सफर में, फ़िर किसी मोड़ पर मिलेंगे,
इन रिश्तों और लम्हों   को फिर से ताजा करेंगे  |
               इन्ही आशाओं को हम साथ लिए जा रहे हैं,
               आज हम वापस  अपने   वतन को जा रहे हैं।

यहाँ  चकाचोंध और डॉलर की खनक में मत फँसना,
एक दिन फ़िर अपने वतन की तरफ़ मुँह करना  |
                हम तुम्हे अपने वतन की याद दिला कर जा रहे हैं,
                आज हम वापस अपने  वतन को जा रहे हैं।

हिम्मत वालों की हार नही होती,यह समझ आगे बढ़ना,
सफलता तुम्हारे कदम चूमे, इतने तुम महान बनना  |
               इन्ही कामनाओं के साथ हम तुमसे बिदा ले रहे हैं,
               आज हम वापस अपने  वतन को जा रहे हैं।

सैन डिएगो (अमेरिका)
१९ जनवरी, २००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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