Tuesday, May 17, 2011

तुलसी का राम




भगवान् राम
मेरे स्वप्न में  आये 
और बोले-

 सुना है तुम    
 एक नयी रामायण  का
  अंकन  करने जा  रहे हो |

    मैंने कहा - हाँ  प्रभु !   
तुलसीदास  जी  ने आपके
 पात्र के साथ न्याय नहीं किया |

राघवेन्द्र  बोले - 
नहीं- नहीं तुम ऐसा   
मत करना | 

मेरा चरित्र
मनुष्य का चरित्र होने 
 के कारण ही महिमा  मंडित है |

   जीवन मूल्यों
 के प्रति  राम की मानवता
को दिखाना ही इस कथा का सार है|


मनुष्य  अपने
  गुणों से देवता बन सकता है 
तुलसी ने यही बताया है |

अतः तुम
नयी रामायण का
अंकन मत करना ।

मुझे तुलसी
का राम ही रहने
  देना |

कोलकता
१७ मई, २०११

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )



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