Tuesday, October 11, 2011

बेटी का बाप

एक बेटी का बाप
अनेक मजबूरियों के साथ
जीवन जीता है। 

बहुत कुछ करने की सामर्थ्य
रखते हुए भी कुछ नहीं कर पाने की
मजबूरी के साथ जीवन जीता है। 

जनक ने अपनी अमूल्य धरोहर को
दाँव पर लगाया कि सीता को योग्य 
वर मिले और वो सुखी जीवन जी सके। 

लेकिन सीता को जंगलो में 
भटकना पड़ा सामर्थ्यवान होते हुए भी
जनक कुछ नहीं कर सके। 

आज भी बेटी का बाप
बेटी के सुखी जीवन के लिए
अपना सब कुछ दाँव पर लगाता है। 

लेकिन बेटी को आज भी
समाज में सब कुछ सहना
और झेलना पड़ता है।  

पुरखों के जमाने से चले आ रहे 
समाज के जंग लगे दस्तूरों को
आज भी उसे निभाना पड़ता है। 

बेटी का बाप बहुत कुछ सामर्थ्य
रखते हुए भी कुछ नहीं कर पाने की
मज़बूरी के साथ जीता है। 


कोलकता
१० अक्टूम्बर २०११
 (यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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