Monday, October 17, 2011

कुछ बात करो

आओ बैठो
कुछ बात करो
अपना हाथ मेरे हाथ पर रखो। 

कुछ मैं कहूँ
कुछ तुम कहो
आओ बैठो कुछ बात करो।

ये शामें-ये घड़ियाँ
ये लहमें बीत जायेगें  
कुछ पल की ही तो बात है।

क्या पता
किस मोड़ पर जिन्दगी
की शाम ढल जाए और
ये रंगों का मेला उठ  जाए ?

झगड़े -समझोतें
मनुहारों का जो जीवन
हमने जिया उन लम्हों को
आओ फिर से ताजा करें।

प्यार-ममता और
अपनापन एक दूसरे को बाँटा
आओ उनकी स्मृति की वादियों
में फिर से खो जाए। 

हँस-हँस कर
एक दूसरे को गुदगुदा
कर जो जीवनका आनंद लिया
आओ उस अमृत धारा को फिर से बरसाएँ। 


सर्दी के मौसम
में गर्म साँसों की महक
और मधुर शरारतों का आओ
एक बार फिर से अभिसार करें। 

साथ-साथ बैठ कर
हाथो में हाथ लेकर
  आओ कुछ बात करें। 

कुछ मैं  कहूँ
 कुछ तुम कहो
आओ कुछ बात  करें। 

  कोलकता
१६ अक्टुम्बर ,२०११
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

 

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