Monday, October 31, 2011

शरद पूर्णिमा

शरद  पूर्णिमा की
चांदनी रात

गीता भवन का
गंगा किनारा

कल-कल करता
गंगा का जल 

लहरे किनारे से टकरा
टकरा कर लौट रही हैं

मै किनारे पर बंधी 
नौका में लैट जाता हूँ

आसमान में चमकते सितारे 
आँखों में छलछला आते  हैं   

जल के संगीत पर
भावना की तरह तैरने लगता हूँ 

गंगा होठों पर बसती जाती है 
और मैं गुनगुनाने लगता हूँ

नैसर्गिक सौन्दर्य को मन की
आँखों से पीने लगता हूँ। 


गीता भवन
२० जुलाई, २०१०
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित  है )

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