Thursday, October 20, 2011

भूख

एक बच्चा
जख्मों से भरा हुआ
मैले कपड़े, नंगे पाँव
माथे में जूँओ को खुजलाता
बासी जूठे और गंदे खाने को
दोनों हाथो से बिचेरते
हुए खा रहा है। 

जिसे अभी -अभी
पार्टी ख़त्म होने पर
मेजपोशों से 
सड़क पर लाकर फेंका है
जैसे लहरें तट पर
कूड़ा फेंक जाती है। 

पास ही
एक कुते का पिल्ला
उसी खाने को पूरे जोर से
बिचेरते हुए खा रहा है। 

दोनों अपनी अपनी
सुधा मिटाने में लगे हुए हैं
बीच-बीच में दोनों एक 
की तरफ देख लेते हैं। 

उदास शाम
डरावनी रात और
पेट की भूख ने
दोनों को
एक सूत्र में बाँध दिया है।

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )


1 comment:

  1. बहुत सुन्दर एंव गहन अभिव्यक्ति

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