Saturday, September 12, 2009

गाँव का विकास


मेरे गाँव में कभी दूध की नदियाँ बहती थी,
आज वहाँ शराब की नदियाँ बहती है,
मेरे गाँव का विकास  हो रहा है  !

मेरे गाँव में कभी निर्विरोध चुनाव होते थे,
आज पूरे  विरोध के साथ चुनाव होते हैं,
मेरे गाँव का विकास हो रहा है  !

मेरा गाँव कभी भाईचारे की मिशाल होता था,
आज भाईचारा नफरत की गंध में खो रहा है,
मेरे गाँव का विकास हो रहा है  !

मेरे गाँव के लोग कभी सुख की नींद सोते थे,
आज सबकी नींद हराम हो गई है,
मेरे गाँव का विकाश हो रहा है  !

मेरे गाँव की गोरियाँ कभी चुनरी-लहंगा पहनती थी,
आज राधा, सीता, गीता सब जींस पहनती है,
मेरे गाँव का  विकास  हो रहा है  !

पनघट पर कभी छम-छम पायल बजती थी,
आज गांव का कुँवा-पनघट सूना पड़ा है,
मेरे गाँव का विकास हो रहा है  !

गुवाड़ में कभी कुस्ती और मुकदर के खेल होते थे,
आज वहां सियासत के अखाड़े लगते हैं,
मेरे गांव का विकास हो रहा हैं  !


कोलकत्ता
१२ सितम्बर, २००९

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )
(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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