Saturday, July 2, 2011

आवो गीत गाये

कलकल करते झरनों में गीत है,
गड़-गड़  करते बादलो  में  गीत  है,
           पंछियों  की  चहचहाट में गीत है,
           लहलहाती फसलों  में भी गीत है।

घाटियों की सांय-सांय में गीत है,
नदियों    के  निनाद में  गीत   है,
           समुद्र    के   जलघोष में गीत   है,
           सनसनाती  हवाओ  में   गीत   है।
 
भंवरों   के गुंजन में   गीत   है,
चिडियों के चहचहाने में गीत है,                              
           पपीहा के   बोलने   में   गीत है,
           कोयल के मीठे स्वर में गीत है.

प्रकृति में सर्वत्र गीत ही गीत है,
लेकिन   हमारे  गीत कहां   है ?
           हम  क्यों नहीं गीत  गा रहे  है.?
           हमारी जिन्दगी के गीत कहां  है ?
   
लोकगीत और भक्ति गीत कहां है ?
बाल गीत और खेल गीत कहां  है ?
           शौहर गीत और गाथा गीत कहां  है ?
           मेहंदी गीत और मेले के गीत कहां है ?

जन्म  का  जलवा गीत कहां है ?
विवाह के विदाई गीत  कहां  है ?
           सावन के बरखा गीत कहां है ?
           चैत्र  मास चैत्रा गीत  कहां है ?

तीज और होली के गीत कहां है ?
गणगौर और झूलों के गीत कहां है ?
           चरखा और चक्की के गीत कहां है ?
           कजली और लावनी के गीत  कहां है ?

प्रकृति अपने हर रंग में गा रही है |
हमें भी गुनगुनाने को कह रही है |
           आवो हम फिर से अपने गीत गुनगुनाये 
           जिन्दगी को प्यार के गीतों से सजाये।   

कोलकत्ता
२ जुलाई, २०११

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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