Monday, September 19, 2011

मामूली कविता

मैंने आज एक
मामूली कविता लिखने
की सोची है |

मामूली कविता
लिखने का  एक अलग ही
अंदाज  होता है |

मामूली कविता
किसी  पर भी लिखी जा सकती है
यह डायरी का  सा  लिखना होता है |


अपने एक सहपाठी पर भी
जिसके घर से आये  नाश्ते के लड्डू
निकाल  कर  खा जाते  थे |@


अपने छपे पुराने लेख 
और कविताओ के संग्रह पर भी 
जो माँ  ने दे दिए थे | #


फिल्म गंगा जमना  पर भी
जिसको  भूगोल का पाठ समझ कर
देखने चले गए थे | $


मामूली कविता
लिखने वाला भी निश्चिंत
होकर लिखता है |


क्योंकि मामूली कविता को
कभी कोई भूल से भी
नहीं  चुराता है  |

और अंत में चार लाइने
जहाँ से  इस कविता को
लिखने की प्रेरणा मिली ।

लारलप्पा, बटाटा बड़ा,
इलू-इलू, इना-मिना-डिका
जैसे गानों को सुन सुन  कर |


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@ :--मालचंद करवा नवलगढ़ कोलेज हॉस्टल में मेरा रूम पार्टनर  था |  वह  रात को रजाई ओढ़ कर लड्डू खाया करता  | सुबह जब वह  स्नानं करने जाता ,  हम अलमारी खोल कर उसके लड्डू खा लिया करते |  वो जब देखता कि  लड्डू गिनती में कम हो रहे है,  तो  हमसे पूछता |  हम कह देते रात में  रजाई में तुमने कितने  लड्डू खाए कोई गिनती है क्या ?  और वो निरुतर हो जाता |

#:-- कोलेज में पढ़ते समय मैं  कुछ लेख और कहानिया लिखा करता था, जो समय - समय पर पत्र - पत्रिकाओं में छपती  रहती थी |    मै उनको घर  ले जा कर  रख दिया करता था | एक दिन गाँव से आयदानाराम की माँ आई और कहने लगी सेठानी जी थोड़े कागज़  दे दो , दो- चार ठाटे बनालू  | माँ ने मेरी सारी पत्र - पत्रिकाए उठा कर उसको दे दी |

$ :--मै उस समय कक्षा  नौ में पढ़ता था  |  भूगोल में एक पाठ  था -  गंगा जमुना  का मैदानी भाग  | मै अपने गाँव बल्दू से सुजानगढ़ एक विवाह में शामिल होने आया था | तांगे पर एक आदमी माइक  ले कर फिल्म गंगा जमुना  के बारे में प्रचार कर रहा था |  मैंने सोचा, जरुर इस फिल्म में गंगा जमुना   के मैदानी इलाको के बारे में दिखाया गया  होगा  | मै पिताजी से पूछ  कर फिल्म देखने चला गया | उसके बाद क्या देखा,  वो तो आप  भी  जानते  हैं |



कोलकत्ता
१९ सितम्बर,२०११

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है। )

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