Wednesday, September 7, 2011

टाबरपण का सुख

थारा प्रेम का
चार आखर लिख्योड़ा 
कागज़ आज भी माळिया
की संदूक में पड्या है। 

जद कद भी
ऊपर माळिया में जाऊँ
थारी प्रीत री निशाणी
ने बांच"र आऊँ। 

थारो दियोड़ो
गुलाब रो फूल आज भी 
पोथी  के पाना के बीच
रख्योड़ो पड्यो है।

पोथी खोलतां ही
आज  भी प्रीत  री  
खुशबू बिखेरै  है। 

थारी भेज्योड़ी
रेशमी रूमाल आज भी
चोबारा के आला  में पड़ी है। 

हाथ में लेता हीं 
मधरी -मधरी महक आज भी
मन में छा  ज्यावे है। 

टाबरपण का
संजोयोड़ा सुख आज भी
घणो सुख  देवै है।



कोलकत्ता
७ सितम्बर,२०११

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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