Saturday, September 24, 2011

साँस की कीमत

माँ ने रोज 
की तरह  सूर्यास्त से
पहले ही खाना खा लिया।

सुबह के लिए
स्नान घर में पानी की बाल्टी
अपने पहने के कपड़े रख लिए। 

कबूतरों को सवेरे
दाना डालने  वाला कटोरा
भी भर कर कमरे मे रख लिया। 

गीता और माला
भी हमेसा की तरह
 सिरहाने रखना नहीं भूली।

प्रातः बेला में
जब उठी तो कहने लगी
थोड़ा जी घबरा रहा है। 

हम कुछ समझ पाते
इतने में ही मृत्यु ने
बाज की तरह
झपटा मारा और
 ले उड़ी माँ की साँसों को। 

एक क्षण पहले 
तक जो माँ जीवित थी
दूसरे ही क्षण शव बन चुकी थी। 

नहीं जगा पाया
माँ को मेरा विलाप
 बहुओ और पोतो का आर्तनाद। 

वे  हमारी
 आवाजो की दुनिया
से अब बहुत दूर'जा चुकी थी। 

आज पहली बार
मैंने एक साँस की कीमत को
पहचाना था। 

कोलकत्ता
२४ सितम्बर, २०११
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )




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