Tuesday, January 22, 2013

खानाबदोश औरत




खानाबदोश औरत
अपनी मांसल देह के साथ
बिना थके नापती रहती है
पुरे प्रदेश को।

लम्बे-चौड़े डग भरती
चलती चली जाती है
परिवार के साथ
एक से दुसरे गाँव को।

बिना सर्दी-गर्मी की
परवाह किये कहीं भी  
डाल लेती है डेरा
सिर छुपाने को।

चक्कर लगाती रहती है
ट्रको और बसों का
झोली में रखे सामन
बेचने को।

ड्राइवर होठो पर
कुटिल मुस्कान लिए
घूरते है उसके माँसल
बदन को।

समेटती खुद को
उन भेदती निगाहों से जो
छील देती जिस्म के
अंतस को।

सांझ ढले वह
माँ, बहन, पत्नी होती है
लेकिन वो डेरा होता है
घर नही होता उसका।

अपने घर का सपना
उसकी आँखों में ही रह जाता है
नहीं लगता उसे कभी
घर बनेगा उसका।



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