Monday, July 28, 2014

६ जुलाई २०१४




६ जुलाई २०१४  का
वह मनहूस दिन जब
सुबह-सुबह सूटकेस में
मेरे कपडे रखते हुए
तुम मुझे बता रही थी
कि तुमने क्या-क्या रखा है 

एक थैले में
गिफ्ट पैकेट रखते हुए
तुम यह कहना भी नहीं भूली कि
सहपाठी के बेटे के विवाह में देने हेतु
गिफ्ट भी रख दिया है 

सदा की भाँती
दरवाजे तक आकर
तुमने मुझे और श्याम को
मुस्कराते हुए विदा किया 

किस को पता था
कि आज की यह विदाई
हमारी आखिरी विदाई होगी

मै रास्ते में
तुमसे फोन पर
बाते करता रहा
सभी कुछ तुमसे पूछता रहा

तुमने पूजा की या नहीं 
नास्ता किया या नहीं  
खाना खाया या नहीं

शाम सवा चार बजे
जब मैंने तुमसे पूछा कि 
तुमने चाय  पी या नहीं

उस समय मुझे
तुम्हारी आवाज में
भारीपन लगा

मेरे पूछने पर
तुमने कहा कि 
नहीं मै ठीक हूँ

अचानक साढ़े चार बजे 
मनीष का फोन आया कि वो 
तुम्हे हॉस्पिटल ले जा रहे हैं 
तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है

मै घबरा गया
मैंने श्याम से कहा -
तुरंत गाडी घुमाओ और
फरीदाबाद वापिस चलो 

पांच मिनट के बाद
मनीष घबराई आवाज में बोला-
हम हॉस्पिटल के रास्ते में है
लेकिन लगता है बाई नहीं रही

हॉस्पिटल पहुँचने पर
डॉक्टरों ने बताया कि तुम
अपनी ईह लीला समाप्त कर चुकी हो 

सुजानगढ़ से फरीदाबाद
पहुँचाने में सात घंटें लग गए
आँसूं थमने का नाम नहीं ले रहे थे 

श्याम ने हिम्मत रखी
निर्लिप्त भाव से
गाड़ी चलाता रहा।  


फरीदाबाद 
२८ जुलाई, २०१४ 





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