Sunday, August 31, 2014

कैसे निभाऊँ अपना कृतव्य







जब तलक तुम थी
घर-बाहर के सभी
छोटे-मोटे निर्णय
तुम कर लिया करती थी 

तुम्हारे जाने के बाद 
यह भार मुझ पर
आ गया 

लेकिन मैं
तुम जैसा सामर्थ्य 
कहाँ से लाऊँ 

प्रियजन भी कहते हैं 
अब आपको ही
माँ और बाप दोनों का प्यार 
बच्चों को देना होगा 

लेकिन मैं  
तुम जैसा ह्रदय
कहाँ से लाऊँ 

कल शशि पूछने लगी
दस दिन पिहर जा कर
आ जाऊं क्या ?

मेरी आँखों में अश्रु छलक पड़े
मेरा गला रुँघ गया
मैं केवल इतना कह पाया-
'हाँ-ना कहने वाली तो 
चली गयी'

अब तुम ही बताओ 
बिना तुम्हारे कैसे निभाऊँ 
यह सब दायित्व 

कहाँ से लाऊँ 
इतना साहस कि 
निभा सकु अपना कृतब्य। 







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