Sunday, August 3, 2014

एक प्रेम कहानी का अन्त




शादी के सात फेरे
लेते समय
हमने एक दूज को
वचन दिया था कि
सुख दुःख में
एक दूजे का साथ देंगे

फिर कौन सी गलती हुयी
कौन सी कमी रह गयी
जो तुम मेरा साथ
छोड़ कर चली गयी

तुम तो मेरे  चहरे पर
उदासी देख कर भी
घबरा जाती थी

आज मेरी आँखों से
अश्रुमेघ बरस रहे
तुम इतनी निर्मम
क्यों हो गयी

आज तुम्हारे बिना सब कुछ
सुनासुना लगने लगा है
जीवन भी मौत से
बदतर लगने लगा है

तुम थी तब तक जिंदगी
भोर की लालिमा लगती
आज वो साँझ की
कालिका बन गयी है

आज किस आशा के सहारे जीवूं
किस के साथ  बैठु और
किस के साथ मन की बात करू

अब तो घुटन
तड़पन
उदासी
अकेलापन
यही रह गया है
जीवन  में

एक अवसाद सा
छाता चला जा रहा
है मन पर

मेरे जीवन में अब
सुख का सावन कभी
नहीं बरसेगा

जीवन की इस साँझ
का अब कोई सवेरा
नहीं होगा

तुम  मुझे बीच
राह में छोड़ कर
क्यों चली गई

क्यों तुमने मेरी प्रेम कहानी
का अन्त अधूरेपन के साथ
ख़त्म कर दिया ?











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