Thursday, August 16, 2012

समन्दर के किनारे






समन्दर के किनारे
देखा लहरें आ रही थी 
किनारे से टकरा कर जा रही थी
जीवन में दुःख-सुख भी तो
इसी तरह से आते-जाते हैं

समन्दर के किनारे
पड़ी रेत को मुट्ठी में उठाया
देखा कण-कण निकलता जा रहा है
जीवन भी तो इसी तरह क्षण-क्षण
बीतता जा रहा है। 

समन्दर के किनारे
पड़ी सीपियों को देखा जो
अपना अनमोल मोती खो चुकी थी
मानव जीवन भी तो अनमोल है जिसे
हम व्येर्थ में खोते जा रहे हैं 


किनारे से टकराती 
पीछे से लहर की आवाज आई
मैं जीवन की बाजी जीत गयी
समन्दर बोला-अब लौटजा 
तुम्हारी अवधि बीत गयी ।




  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]

Monday, August 13, 2012

प्रेसबी की नर्स "रोज "

प्रेसबी की नर्स  "रोज "
मनीष से  बाते कर रही थी
बगल मे खड़ा डॉक्टर
काफ़ी देर से  सुन रहा था

उसने रोज से पूछा -
क्या तुम इसे जानती हो ?
रोज तपाक से बोली -हाँ
यह मेरा छोटा भाई है

मै थोड़ी ज्यादा गौरी हुँ
ये थोड़ा कम गौरा है
लेकिन मै भी अब
इसकी तरह होने लग गयी हूँ

थोड़े दिनो मे
हम दोनो  का रंग
एक जैसा हो जाएगा
फिर तुम नही पूछोगे

और उसी के साथ "रोज"का
चिर परिचित हँसी का
एक जोरदार ठहाका
डॉक्टर झेंप कर हँसने लगा। 

प्यारी नर्स "रोज़"

युनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्टसबर्ग
'प्रेसवीटेरियन हॉस्पिटल'
हार्ट कैथ डिपार्टमेन्ट मे
काम करने वाली नर्स 'रोज़'

गुलाब की तरह खिलनेवाली
खिलखिला कर हँसने वाली
डिपार्टमेंट में सबकी प्यारी
जिन्दादिल नर्स 'रोज़'

उसकी हँसी का ठहाका
गूँजता पूरे डिपार्टमेंट में 
जब भी हँसती दिल खोल
कर हँसती 'रोज़'

हरसिंगार फूल की तरह
झड़ती उसकी हँसी
सबका मन मोह लेती 'रोज़'

हँसते दूसरे भी
लेकिन वो हँसते कम
मुस्कराते ज़्यादा
ठहाका लगाती सिर्फ़ 'रोज़'

वह जब भी हँसती
बेड पर सोया बीमार भी
दर्द को भूल, मुस्करा उठता
सब के दिलों में बसी रहती
प्यारी नर्स  'रोज़'। 


( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )
 

 


कलैंडर नहीं जीवन बदलो





प्रत्येक महीने हम
बदलते रहते है कलैन्डर
लेकिन नही बदलते जीवन

तारीख़े लाल घेरों
में ही क़ैद रह जाती है
मुट्ठी से बालू  की तरह
खिसक जाता है जीवन

न जाने कितनी
पूनम की रातें
दरवाजे की सांकल
बजा कर ही लौट जाती है          

पूरब की बंसन्ती हवाऐं
बिना मन को झकझोङे
ही चली जाती है

चैत की औस-भीगी सुबह
हमारी अंगड़ाई से पहले ही
निकल जाती है

आजकल तो धूप भी
बंद दरवाजों को  देख कर
सीढ़ियों से ही लौट जाती है

जीवन का आनन्द लेना है 
तो प्रकृति से जुड़ना होगा
किसी नौका में बैठ कर 
नदी
की सैर पर जाना होगा 

पहाड़ की ऊँची 
चोटी पर चढ़ना होगा
बादलो की कोख से निकलते

सूर्योदय को देखना होगा 

फुलो पर मंडराते भँवरों
का गुंजन सुनना होगा 
डूबते हुए सूर्यास्त का
नजारा देखना होगा

यदि जीवन का सच्चा आनंद लेना है 
तो कलैण्डर नहीं जीवन को
बदलना होगा।





[ यह कविता "एक नया सफर " पुस्तक में प्रकाशित हो गई है। ]

Sunday, August 12, 2012

जूते की पहचान




रास्ते की ठोकरों को  झेलता रहा जूता 
 पाँवों    को  ठोकर से बचाता रहा जूता

                                                                           सर्दी हो या गर्मी, बसंत हो  या बरसात 
                                                                              हर  मौसम मे साथ निभाता रहा जूता 

 
रेगिस्तान की बालू मे झुलस्ता रहा जूता
 पहाड़ों के पत्थरो से देह रगङता रहा जूता

                                                                               सियाचीन की ठंडक मे मुस्तेद  रहा जूता 
                                                                                हर जगह पाँवों का रक्षक बनता रहा जूता 

 
रैस   के   मैदान   मे   दौङता रहा जूता
खेल   के मैदान   मे  खेलता रहा जूता

                                                                             जंग   के   मैदान  मे  लड़ता रहा जूता
                                                                               पाँवों   को   हिम्मत बँधाता रहा   जूता  


जंगलो   की   खाक  छानता  रहा जूता
 रास्तों  का  भूगोल   लिखता रहा जूता

                                                                              पैरो  के पसीने   को   चखता रहा जूता 
                                                                                 घर के  दरवाजे  पर   पड़ा   रहा   जूता 

 
र्हिमालय की  चोटी को लाँघ आया जूता
   अंटार्टिका की बर्फ  को चूम आया जूता

                                                                                    चाँद  तक   का सफर कर  आया जूता
                                                                                    फिर भी नाम रोशन नही कर पाया जूता  

  
   इन्सान की कामयाबी मे साथ रहा जूता 
           होली पर गले का हार बनता रहा जूता  
     
                                                                                 जब से नेताऒं के  सिर पड़ने लगा जूता 
                                                                                   तभी से अपनी पहचान  बना पाया जूता। 



  [ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]




Monday, August 6, 2012

दिल का रिस्ता







रिस्ते पैसों से नही बनते
रिस्ते बनते है दिलो से
दिल का रिस्ता हर रिस्ते
से बड़ा होता है।

दो घंटे सुबह साथ घूमते है
साथ चाय पीते है,
इस दो घंटे के साथ ने
हमे गहरे जोड़ रखा है।

यही है रिस्ते की गहराई
यही है रिस्ते की बुनियाद
इतना गहरा की हर
दुख सुख मे साथ होते है।


खून के रिस्ते से भी
कहीं ज़्यादा भरोसे मंद
और हर रिस्ते से उपर
दिल का रिस्ता होता है।

दिल का रिस्ता कभी भी
अमीर ग़रीब नही देखता है
इसी कारण दिल का
हर रिस्ते से बड़ा होता है।

मै तुम्हे प्यार करता रहूँ




सरगम सी  खनकती आवाज हो तुम
दिल को सकून दे वो अहसास हो तुम
मै तुम्हारी कोयल सी आवाज सुनता रहूँ
मै तुम्हें प्यार करता रहूँ

अरुणिम उषा सी मन पर छायी हो तुम
मधुमास सी अमराइयाँ महकाती हो तुम
मै सोनचंपा सी याद सांसों में समाता रहूँ
मै तुम्हें प्यार करता  रहूँ

हजारों गुलों में एक गुलाब हो तुम
फूलों के गुलिस्तान की सरताज हो तुम
मै कुसुमों से अंकित आँचल छूता रहूँ
मै तुम्हें प्यार करता रहूँ

मेरे प्यार का सत्य शिव सुन्दर हो तुम
मेरी भावनाओं की संवेदना हो तुम
मै तुम्हारी आँखों में प्रीत झांकता रहूँ
मै तुम्हें प्यार करता रहूँ

मेरी जिन्दगी में बहार बन कार आयी तुम
मेरे जीवन में फागुनी त्योंहार बन खिली तुम
मै दिल के कोने में तुम्हारा नाम लिखता रहूँ
मै तुम्हें प्यार करता रहूँ ।


[ यह कविता "कुछ अनकही***" में प्रकाशित हो गई है। ]